नए अमेरिकी आदेश के तहत भारतीय उत्पादों पर औसतन 18 प्रतिशत टैरिफ लागू है, जबकि चीन के सामान पर करीब 35 प्रतिशत शुल्क है. इसका मतलब है कि अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पाद चीनी उत्पादों की तुलना में ज्यादा सस्ते पड़ते हैं. टेक्सटाइल, फार्मा, ऑटो पार्ट्स, जेम्स एंड ज्वेलरी और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे सेक्टर में इससे भारतीय कंपनियों को बड़ा फायदा मिल सकता है.
चीन प्लस वन रणनीति से भारत को फायदा
ग्लोबल कंपनियां अब चीन के अलावा दूसरे देशों में मैन्युफैक्चरिंग बेस बना रही हैं. इसकी वजह चीन पर ज्यादा टैरिफ, जियोपॉलिटिकल तनाव और बढ़ती लागत है. भारत को इस रणनीति का बड़ा लाभ मिल रहा है, क्योंकि यहां युवा वर्कफोर्स, इंग्लिश बोलने वाला टैलेंट और बड़ा घरेलू बाजार मौजूद है. पीयूष गोयल ने कहा है कि अगर दुनिया को चीन प्लस वन चाहिए, तो वह भारत में होना चाहिए.
भारत की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था
भारत की अर्थव्यवस्था फिलहाल करीब 4 ट्रिलियन डॉलर की है और 2047 तक इसे 30 से 35 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य है. चीन की ग्रोथ स्लो हो रही है, जबकि भारत को भविष्य की बड़ी ग्रोथ मार्केट के रूप में देखा जा रहा है. कंपनियां भारत में निवेश करके न सिर्फ निर्यात बल्कि घरेलू बाजार से भी फायदा उठा सकती हैं.
भारत की मजबूत ट्रेड नेगोशिएशन पोजिशन
भारत ने हाल के वर्षों में कई देशों के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट किए हैं, जिससे भारतीय कंपनियों को बड़े बाजार मिले हैं. पश्चिमी देश भारत को एक भरोसेमंद पार्टनर मान रहे हैं, जबकि चीन को टैरिफ और जांच का सामना करना पड़ रहा है. इससे भारत की ग्लोबल ट्रेड पोजिशन मजबूत हुई है.
कृषि और संवेदनशील सेक्टर सुरक्षित
भारत ने डेयरी, पोल्ट्री, गेहूं, चावल और सोयाबीन जैसे संवेदनशील सेक्टर खोलने से इनकार किया है. इससे किसानों के हित सुरक्षित रहे हैं. चीन को अतीत में कृषि सेक्टर खोलने का दबाव झेलना पड़ा था, लेकिन भारत ने बड़े घरेलू बाजार के दम पर अपनी शर्तों पर समझौता किया है.
आम आदमी के लिए क्या मतलब
अमेरिका में भारतीय सामान सस्ता होगा, जिससे भारतीय कंपनियों का निर्यात बढ़ सकता है. इससे फैक्ट्रियों में निवेश, नौकरियां और मैन्युफैक्चरिंग ग्रोथ बढ़ने की उम्मीद है. लंबे समय में भारत को ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने में यह समझौता बड़ी भूमिका निभा सकता है और विकसित भारत के लक्ष्य को गति मिल सकती है.
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