भारत और अमेरिका के बीच होने वाली अगली ट्रेड वार्ता पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं. ऊंचे टैरिफ, कृषि विवाद और रूसी तेल से जुड़े मुद्दों ने बातचीत को और जटिल बना दिया है. इसके बावजूद भारत जल्दबाजी में किसी समझौते के मूड में नहीं दिख रहा है.
टैरिफ और कोर्ट के फैसले की अहम भूमिका
भारत को साल 2025 से अमेरिका में अपने कई उत्पादों पर 50 फीसदी तक का भारी टैरिफ झेलना पड़ रहा है. इसी बीच अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट उस कानूनी अधिकार पर फैसला देने वाला है, जिसके तहत ट्रंप प्रशासन ने आपातकालीन शक्तियों का इस्तेमाल कर बड़े टैरिफ लगाए थे. अगर कोर्ट इन टैरिफ को गलत ठहराता है, तो भारत समेत कई देशों के निर्यात को राहत मिल सकती है, जबकि फैसला बरकरार रहने पर दबाव और बढ़ सकता है.
रूसी तेल और 500 फीसदी टैरिफ बिल की चिंता
इन ट्रेड टॉक्स के बीच अमेरिका में एक प्रस्तावित बिल ने नई अनिश्चितता पैदा कर दी है. इस बिल में रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 500 फीसदी तक का दंडात्मक टैरिफ लगाने की बात कही गई है. भारत ने साफ किया है कि वह इस प्रस्ताव पर नजर बनाए हुए है. नई दिल्ली का कहना है कि 140 करोड़ लोगों के लिए सस्ती ऊर्जा सुनिश्चित करना उसकी प्राथमिकता है, लेकिन वह अपने व्यापारिक और कूटनीतिक हितों को भी संतुलित करने की कोशिश कर रहा है.
अमेरिकी पक्ष क्या कह रहा है
अमेरिका में भारत के राजदूत सर्जियो गोर ने कहा कि दोनों देश लगातार संपर्क में हैं और अगली ट्रेड बातचीत जल्द होने वाली है. उनके मुताबिक, भारत दुनिया का सबसे बड़ा देश है, इसलिए किसी समझौते तक पहुंचना आसान नहीं है, लेकिन दोनों पक्ष कोशिश में जुटे हैं. उन्होंने यह भी संकेत दिया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का भारत दौरा संभव है, जिससे इन वार्ताओं को राजनीतिक महत्व भी मिल रहा है. हाल ही में अमेरिकी उप व्यापार प्रतिनिधि की भारत यात्रा भी इसी कड़ी का हिस्सा रही है.
कृषि और डेयरी सबसे बड़ा विवाद
भारत-अमेरिका ट्रेड वार्ता में सबसे बड़ी अड़चन कृषि और डेयरी सेक्टर बने हुए हैं. अमेरिका चाहता है कि भारत बादाम, मक्का, सेब जैसे कृषि उत्पादों पर ड्यूटी में छूट दे और बाजार खोले. वहीं भारत का मानना है कि ऐसा करने से उसके किसान और छोटे कारोबारियों को नुकसान हो सकता है. इसी वजह से भारत इन क्षेत्रों में किसी भी तरह की बड़ी रियायत देने से बच रहा है, भले ही अन्य सेक्टरों में बातचीत आगे बढ़ रही हो.
जल्द नतीजे की उम्मीद क्यों नहीं
जानकारों का मानना है कि इस दौर की बातचीत से किसी बड़े ब्रेकथ्रू की उम्मीद कम है. हालांकि, लगातार संवाद यह दिखाता है कि दोनों देश आर्थिक तनाव को बढ़ने नहीं देना चाहते. भारत की रणनीति साफ है-वह जल्दबाजी में समझौता करने के बजाय अपने हितों की रक्षा करते हुए लंबी बातचीत के पक्ष में है. यह रुख बताता है कि व्यापारिक मतभेदों के बावजूद भारत और अमेरिका अपनी व्यापक रणनीतिक साझेदारी को कमजोर नहीं होने देना चाहते.
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Rakesh Singh is a chief sub editor with 14 years of experience in media and publication. International affairs, Politics and agriculture are area of Interest. Many articles written by Rakesh Singh published in …और पढ़ें
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