इस नए टूल ने इंडस्ट्री स्पेसिफिक ऑटोमेशन लाया है, मतलब एआई अब खुद से पूरा वर्कफ्लो हैंडल कर सकता है जैसे लीगल कॉन्ट्रैक्ट चेक करना, कोड मैनेजमेंट, डॉक्यूमेंट हैंडलिंग, सेल्स, मार्केटिंग और डेटा एनालिसिस के काम बिना इंसान की मदद के. इससे निवेशकों को डर लगा कि सॉफ्टवेयर-एज-ए-सर्विस यानी एसएएस कंपनियां और आईटी सर्विसेज का बिजनेस खतरे में पड़ सकता है. इसे लोग ‘सास्पोकैलिप्स’ कह रहे हैं, यानी एसएएस और आईटी आउटसोर्सिंग के लिए बड़ा झटका. इस पूरे घटना के बीच एक भारतीय मूल के टेक लीडर का नाम बहुत चर्चा में है और ये शख्स है राहुल पाटिल.
कौन है राहुल पाटिल?
राहुल पाटिल एन्थ्रोपिक के चीफ टेक्नोलॉजी ऑफिसर यानी सीटीओ हैं. अक्टूबर 2025 में उन्हें इस बड़े पद पर नियुक्त किया गया था. राहुल पाटिल बेंगलुरु के रहने वाले हैं, उन्होंने पीईएस यूनिवर्सिटी (पहले पीईएस इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी) से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की. उसके बाद अमेरिका में एरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी से एमएस और वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी से एमबीए किया.
कहां से हुई राहुल पाटिल के करियर की शुरुआत?
करियर की शुरुआत माइक्रोसॉफ्ट से हुई, जहां उन्होंने करीब नौ साल काम किया. फिर अमेजन के किनेसिस (एडब्ल्यूएस) में, उसके बाद ओरेकल क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर में एसवीपी के तौर पर 30 से ज्यादा प्रोडक्ट्स जैसे कंप्यूट, स्टोरेज, सिक्योरिटी और मॉनिटरिंग संभाले. पांच साल तक स्ट्राइप में इंजीनियरिंग और ग्लोबल ऑपरेशंस लीड किए, जहां वे सीटीओ भी रहे.
राहुल पाटिल ने लिंक्डइन पर लिखी थी ये बात
एन्थ्रोपिक में आने के बाद उन्होंने क्लाउड को बड़े स्तर पर एंटरप्राइज के लिए तैयार किया. फोकस किया इंफ्रास्ट्रक्चर, स्पीड और कॉस्ट ऑप्टिमाइजेशन पर. महंगे जीपीयू पर क्लाउड को बेहतर तरीके से चलाने के लिए मेमोरी यूज और डिकोडिंग को तेज किया, ताकि रनिंग कॉस्ट कम हो. टीमों को रीऑर्गनाइज किया ताकि प्रोडक्ट, इंफ्रास्ट्रक्चर और एआई इंजीनियर्स साथ मिलकर काम करें. इससे क्लाउड के हमेशा ऑन रहने वाले एआई एजेंट्स कंपनी को डायरेक्ट ऑफर करने लायक बने.
वॉल स्ट्रीट पर इसे ‘पाटिल इफेक्ट’ कहने लगे हैं. राहुल पाटिल ने लिंक्डइन पर लिखा कि वे एन्थ्रोपिक की हंबल, ब्रिलियंट और मेहनती टीम में शामिल होकर खुश हैं, जो दुनिया में एआई की इमेजिनेशन और एक्साइटमेंट जगाती है. एन्थ्रोपिक अब 183 बिलियन डॉलर वैल्यूएशन वाली कंपनी है, हाल में 13 बिलियन डॉलर फंडिंग मिली. रेवेन्यू रन-रेट 5 बिलियन डॉलर से ज्यादा हो गया है. कंपनी बेंगलुरु में बड़ा ऑफिस खोल रही है, जो टोक्यो के बाद दूसरा ग्लोबल हब बनेगा, ताकि भारतीय टैलेंट का फायदा उठाया जा सके. राहुल जैसे भारतीय मूल के लीडर्स सिलिकॉन वैली में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं. उनका काम दिखाता है कि एआई अब सिर्फ चैटबॉट नहीं, बल्कि पूरा बिजनेस प्रोसेस बदल सकता है. ऐसे में भारतीय आईटी सेक्टर को अब एआई स्किल्स पर ज्यादा फोकस करना पड़ेगा, क्योंकि आउटसोर्सिंग के पुराने मॉडल पर दबाव बढ़ रहा है.
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