इकोनॉमिक टाइम्स के मुताबिक, मिडिल ईस्ट में पानी अब बहुत बड़ा स्ट्रैटेजिक रिसोर्स बन गया है. खाड़ी सहयोग परिषद(Gulf Cooperation Council) के देशों में डिसेलिनेशन प्लांट्स हैं, जो समुद्र के पानी को पीने लायक बनाते हैं और लाखों-करोड़ों लोगों को सुरक्षित पानी देते हैं. लेकिन अब ईरान की मिलिट्री एक्शन से ये प्लांट्स खतरे में हैं. अगर हमले बढ़ते गए तो बड़े पैमाने पर इंसानी संकट आ सकता है और लोग बड़े-बड़े इलाकों से भागने को मजबूर हो सकते हैं. अमेरिकी CIA इसे मिडिल ईस्ट की “स्ट्रैटेजिक कमोडिटी” कहता है, लेकिन ये तेल या नेचुरल गैस नहीं, बल्कि पीने का पानी है. अगर अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध और तेज हुआ तो पानी ही वो चीज बन सकता है जो युद्ध को नया रूप दे सकता है.
अमेरिकी पॉलिसीमेकर्स के लिए चेतावनी
खाड़ी इलाके तेल से भरपूर है, ट्रिलियंस डॉलर का हाइड्रोकार्बन है, लेकिन पानी की कमी है. 1970 के दशक से तेल के पैसे से डिसेलिनेशन प्लांट्स बनाए गए. आज करीब 450 ऐसे प्लांट्स हैं जो लोगों को प्यासा नहीं होने देते. CIA ने दशकों से अमेरिकी पॉलिसीमेकर्स को चेतावनी दी है कि इन प्लांट्स पर निर्भरता बहुत रिस्की है. 1980 के शुरुआती सालों में एक गुप्त रिपोर्ट में CIA ने कहा था कि कुछ देशों के बड़े अधिकारी पानी को तेल से ज्यादा महत्वपूर्ण मानते हैं राष्ट्र की भलाई के लिए. आज भी यही हाल है. डिसेलिनेशन तकनीक सस्ती है, लेकिन प्लांट्स कमजोर हैं और इन्हें चलाने के लिए तेल-गैस की बहुत खपत होती है.
डिसेलिनेशन प्लांट पर बड़ा खतरा
Gulf Cooperation Council के देशों में करीब 10 करोड़ लोग रहते हैं. इनमें सऊदी अरब, कुवैत, बहरीन, कतर, यूएई और ओमान शामिल हैं. ये सब अब ईरानी हमलों के निशाने पर हैं. कुवैत, कतर और यूएई पूरी तरह इन प्लांट्स पर निर्भर हैं, खासकर दुबई जैसे शहरों के लिए. सऊदी अरब और उसकी राजधानी रियाद भी काफी हद तक इन्हीं पर टिकी है. इंटरनेशनल लॉ के मुताबिक, ये प्लांट्स सुरक्षित हैं, लेकिन ईरान ने यूएई के फुजैराह में एक पावर स्टेशन पर हमला किया जो दुनिया के सबसे बड़े डिसेलिनेशन प्लांट को चलाता है. कुवैत में ड्रोन इंटरसेप्ट होने से मलबा गिरा और एक प्लांट में आग लग गई.
ये रिस्क बहुत बड़ा माना जा रहा है. सऊदी अरब का जुबैल डिसेलिनेशन प्लांट रियाद को 90 प्रतिशत से ज्यादा पीने का पानी 500 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन से पानी देता है. 2008 में अमेरिकी एम्बेसी की एक वीकिलीक्स रिपोर्ट में कहा गया था कि अगर ये प्लांट, पाइपलाइन या पावर इंफ्रास्ट्रक्चर को गंभीर नुकसान हुआ तो रियाद को एक हफ्ते में खाली करना पड़ेगा. सऊदी सरकार की मौजूदा संरचना बिना इस प्लांट के नहीं चल सकती. अब सऊदी ने वॉटर नेटवर्क को मजबूत किया है और दूसरे देशों ने भी बैकअप बनाए हैं. लेकिन सभी प्लांट्स ईरानी मिसाइलों की रेंज में हैं. ये है कि पानी इतना अहम और इंसानी है कि ईरान का सीधा हमला बहुत बड़ा एस्केलेशन माना जाएगा, शायद तेहरान इतना आगे न जाए.
ईरान चुन रहा सॉफ्ट टारगेट्स
ईरान ज्यादातर सॉफ्ट टारगेट्स जैसे एनर्जी साइट्स, एयरपोर्ट और पानी के प्लांट्स पर हमला करने का प्लान कर सकता है. ईरान ने सॉफ्ट टारगेट्स चुने भी हैं और लंबे समय तक टिकने की कोशिश कर रहा है. अगर कई प्लांट्स पर हमला हुआ तो खाड़ी देश मुश्किल में पड़ जाएंगे. पानी पर हमला टैबू जैसा है, क्योंकि ये इंसानी जीवन के लिए जरूरी है. लेकिन पिछले सालों में हमने देखा है कि नामुमकिन भी होता है, जैसे रूस ने यूक्रेन में ज़ापोरिज्जिया न्यूक्लियर प्लांट पर गोले बरसाए थे. 1991 में सद्दाम हुसैन ने कुवैत के ऑयल पाइपलाइन के टैप खोल दिए थे ताकि अमेरिकी लैंडिंग रुक जाए और सऊदी डिसेलिनेशन प्लांट्स खराब हों. तेल पर असर होना साफ नजर आ रहा है, लेकिन पानी पर भी असर हो सकता है, जिसके बारे में कोई ध्यान नहीं दे रहा है.
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