भारत के शेयर बाजार में जल्द एक नया बड़ा खिलाड़ी एंट्री करने वाला है. मेट्रोपॉलिटन स्टॉक एक्सचेंज फुल फ्लेज्ड ट्रेडिंग शुरू कर BSE और NSE को सीधी चुनौती देने की तैयारी में है. इससे निवेशकों और ब्रोकर्स दोनों के लिए ट्रेडिंग कॉस्ट और ऑप्शंस के नए रास्ते खुल सकते हैं. अब तक भारत के शेयर बाजार पर BSE और NSE का लगभग पूरा कंट्रोल रहा है. MSE के ऑपरेशनल होने से मार्केट में असली कॉम्पिटिशन आएगा. SEBI अप्रूवल के बाद इक्विटी, डेरिवेटिव्स और कमोडिटी सेगमेंट में नया विकल्प तैयार होगा.
मेट्रोपॉलिटन स्टॉक एक्सचेंज पहले से मौजूद एक प्लेटफॉर्म है जो कई सालों से सीमित सेगमेंट में काम कर रहा था. शुरुआती दौर में यह मुख्य रूप से करेंसी डेरिवेटिव्स तक सीमित रहा. हाल के समय में इसे फुल स्टॉक एक्सचेंज के रूप में काम करने का लाइसेंस मिला है. अब यह इक्विटी, फ्यूचर्स, ऑप्शंस और कमोडिटी डेरिवेटिव्स जैसे सभी बड़े सेगमेंट में ट्रेडिंग शुरू करने की तैयारी कर रहा है. रिपोर्ट्स के मुताबिक सेबी (SEBI) से अंतिम मंजूरी मिलने के बाद अगले कुछ महीनों में इसका फुल ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म लाइव हो सकता है. इसके बाद निवेशक पहली बार NSE और BSE के अलावा एक नए एक्सचेंज पर भी शेयर और डेरिवेटिव्स की खरीद बिक्री कर पाएंगे.
क्यों जरूरी माना जा रहा है यह नया कॉम्पिटिशन
आज भारत के शेयर बाजार में लगभग पूरा मार्केट शेयर दो ही एक्सचेंज के पास है. यही वजह है कि ब्रोकरेज फीस, एक्सचेंज चार्जेस और टेक्नोलॉजी स्टैंडर्ड लगभग एक तय पैटर्न पर चलते हैं. जब विकल्प सीमित होते हैं तो इनोवेशन और कॉस्ट कटिंग की रफ्तार भी सीमित रहती है. मेट्रोपॉलिटन स्टॉक एक्सचेंज का दावा है कि वह कम फीस, बेहतर टेक्नोलॉजी इंफ्रास्ट्रक्चर और नए सेगमेंट अप्रोच के साथ एंट्री करेगा. अगर यह मॉडल सफल होता है तो ब्रोकर्स की लागत कम हो सकती है. निवेशकों को बेहतर एक्जीक्यूशन और नए प्रोडक्ट्स मिल सकते हैं.
BSE और NSE के लिए क्या बदलेगा
नया एक्सचेंज आते ही सीधा दबाव मौजूदा दिग्गजों पर पड़ेगा. ट्रेडिंग फीस, लिस्टिंग चार्ज और टेक्नोलॉजी अपग्रेड जैसे क्षेत्रों में ज्यादा प्रतिस्पर्धा देखने को मिल सकती है. लंबे समय में यह कॉम्पिटिशन पूरे मार्केट को ज्यादा एफिशिएंट बना सकता है. इसके अलावा SME सेगमेंट और नई कंपनियों के लिस्टिंग के लिए भी एक नया प्लेटफॉर्म खुलेगा. इससे छोटे और मिड साइज बिजनेस को पूंजी जुटाने के और विकल्प मिलेंगे.
सबसे बड़ी चुनौती क्या होगी
किसी भी नए स्टॉक एक्सचेंज के लिए सबसे बड़ी चुनौती लिक्विडिटी लाना होता है. ट्रेडर्स वहीं जाते हैं जहां ज्यादा वॉल्यूम और बेहतर प्राइस डिस्कवरी मिलती है. यही वजह है कि नए प्लेटफॉर्म पर भरोसा बनाना आसान काम नहीं होता. मेट्रोपॉलिटन स्टॉक एक्सचेंज को ब्रोकर्स, हाई फ्रीक्वेंसी ट्रेडर्स और बड़े निवेशकों को जोड़ने के लिए मजबूत टेक्नोलॉजी और स्टेबल सिस्टम साबित करना होगा. साथ ही रेगुलेटर और मार्केट पार्टिसिपेंट्स के बीच ट्रस्ट बिल्ड करना भी जरूरी रहेगा.
निवेशकों के लिए इसका क्या मतलब है
अगर नया एक्सचेंज सफल होता है तो आम निवेशकों को लंबे समय में सीधा फायदा मिल सकता है. ट्रेडिंग कॉस्ट कम हो सकती है. प्रोडक्ट्स की वैरायटी बढ़ सकती है. टेक्नोलॉजी अपग्रेड तेज हो सकता है. कुल मिलाकर मेट्रोपॉलिटन स्टॉक एक्सचेंज की एंट्री भारत के कैपिटल मार्केट में एक नए अध्याय की शुरुआत जैसी है. अगर यह प्लेटफॉर्म मजबूत तरीके से स्थापित होता है तो BSE और NSE की जोड़ी को पहली बार एक गंभीर घरेलू प्रतिद्वंद्वी का सामना करना पड़ेगा. यही कॉम्पिटिशन आने वाले वर्षों में भारतीय शेयर बाजार को ज्यादा ट्रांसपेरेंट, इनोवेटिव और निवेशक फ्रेंडली बना सकता है.
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जय ठाकुर 2018 से खबरों की दुनिया से जुड़े हुए हैं. 2022 से News18Hindi में सीनियर सब एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं और बिजनेस टीम का हिस्सा हैं. बिजनेस, विशेषकर शेयर बाजार से जुड़ी खबरों में रुचि है. इसके अलावा दे…और पढ़ें
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