को-लोकेशन विवाद का अंत और भारी-भरकम सेटलमेंट
NSE के आईपीओ की राह में सबसे बड़ा रोड़ा ‘को-लोकेशन’ और ‘डार्क फाइबर’ मामला था, जो पिछले कई साल से लंबित था. अब खबर है कि NSE ने इस मामले को सुलझाने के लिए सेबी के साथ हाथ मिलाया है और लगभग 1,400 करोड़ रुपये के सेटलमेंट अमाउंट पर सहमति बनी है. इसमें 12 प्रतिशत की दर से ब्याज भी शामिल हो सकता है. एक्सचेंज ने हाल ही में अपने वित्तीय नतीजों में इस सेटलमेंट के लिए करीब 1,297 करोड़ रुपये का प्रावधान भी किया है. इस समझौते के बाद अब सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले को वापस लेने की प्रक्रिया शुरू होगी, जिससे आईपीओ की राह पूरी तरह निष्कंटक हो जाएगी.
5 लाख करोड़ की वैल्यूएशन और निवेशकों की चांदी
NSE का यह आईपीओ भारतीय बाजार के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है. मौजूदा बाजार भाव के अनुसार, इस एक्सचेंज की मार्केट कैप लगभग 5 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है. हालांकि, यह साफ कर दिया गया है कि यह एक ‘ऑफर फॉर सेल’ (OFS) होगा. इसका मतलब है कि आईपीओ के जरिए जुटाया गया पैसा सीधे एक्सचेंज के पास नहीं जाएगा, बल्कि इसके मौजूदा शेयरधारक अपनी हिस्सेदारी बेचकर पैसा कमाएंगे. इससे उन निवेशकों को बाहर निकलने का मौका मिलेगा जो लंबे समय से इस मेगा लिस्टिंग का इंतजार कर रहे थे.
लिस्टिंग में लग सकता है 8 से 9 महीने का वक्त
भले ही सेबी से NOC मिल गया हो, लेकिन आम निवेशकों के लिए शेयर खरीदने में अभी थोड़ा समय लगेगा. विशेषज्ञों का मानना है कि DRHP तैयार करने, उसे सेबी के पास जमा करने और अंतिम मंजूरी मिलने की प्रक्रिया में लगभग 8 से 9 महीने का समय लग सकता है. NSE ने पहली बार 2016 में आईपीओ के लिए आवेदन किया था, लेकिन कानूनी विवादों के कारण उसे कदम पीछे खींचने पड़े थे. अब लगभग एक दशक बाद यह सपना सच होता दिख रहा है, जिससे ब्रोकिंग और इन्वेस्टमेंट कम्युनिटी में भारी उत्साह है.
क्या था को-लोकेशन मामला जिसने रोकी थी राह?
इस विवाद को समझना जरूरी है क्योंकि इसी ने सालों तक NSE की लिस्टिंग को लटकाए रखा. आरोप था कि कुछ चुनिंदा ब्रोकर्स ने NSE के सर्वर के बिल्कुल पास अपने सर्वर लगाकर डेटा तक तेजी से पहुंच बनाई, जिससे उन्हें अन्य ब्रोकर्स के मुकाबले अनुचित लाभ मिला. इसे ‘को-लोकेशन’ और ‘डार्क फाइबर’ घोटाला कहा गया. हालांकि कानूनी जानकारों का मानना है कि हालिया अदालती फैसलों में पलड़ा एक्सचेंज की तरफ भारी था, लेकिन शेयरधारकों के दबाव और भविष्य की अनिश्चितता को खत्म करने के लिए बोर्ड ने सेटलमेंट का रास्ता चुनना बेहतर समझा.
बाजार की कार्यप्रणाली पर पड़ेगा दूरगामी प्रभाव
NSE की लिस्टिंग न केवल इसके शेयरधारकों के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भारतीय पूंजी बाजार की पारदर्शिता और परिपक्वता को भी दर्शाएगी. एक लिस्टेड एंटिटी के रूप में NSE को अधिक कड़े नियमों और खुलासों का पालन करना होगा, जिससे निवेशकों का भरोसा और बढ़ेगा. सेबी के पूर्णकालिक सदस्यों (WTM) के पैनल से अंतिम मंजूरी मिलने के बाद, यह मामला पूरी तरह बंद हो जाएगा. इसके बाद NSE दुनिया के अन्य प्रमुख लिस्टेड एक्सचेंजों की श्रेणी में शामिल हो जाएगा, जो भारतीय अर्थव्यवस्था की बढ़ती ताकत का प्रतीक है.
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