Cheque Bounce Rules: बॉलीवुड अभिनेता राजपाल यादव 9 करोड़ रुपये के चेक बाउंस मामले में चर्चा में हैं. उन्होंने 2.5 करोड़ रुपये जमा किए हैं, लेकिन पूरी रकम न चुकाने के कारण वे अभी तिहाड़ जेल में हैं और उनकी अंतरिम जमानत पर सुनवाई टल गई है. भारत में चेक बाउंस को लेकर सख्त कानून हैं, जो नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट 1881 की धारा 138 से 143ए के तहत आते हैं. अगर कोई व्यक्ति कर्ज चुकाने के लिए चेक जारी करता है और बैंक में पर्याप्त राशि न होने के कारण चेक बाउंस हो जाता है, तो यह अपराध माना जाता है.
चेक को जारी होने की तारीख से 6 महीने या वैलिडिटी पीरियड में पेश करना जरूरी है. बैंक बाउंस होने पर 30 दिन के अंदर नोटिस देता है. फिर चेक पाने वाले को बैंक नोटिस मिलने के 30 दिन के अंदर लिखित डिमांड नोटिस भेजना होता है. अगर 15 दिन में पेमेंट नहीं होता तो अपराध बनता है.
2 साल तक की कैद
अगर आरोपी दोषी पाया जाता है तो सजा 2 साल तक की कैद, चेक अमाउंट का दोगुना तक जुर्माना या दोनों हो सकती है. कंपनी के चेक बाउंस होने पर कंपनी और उस समय के जिम्मेदार अधिकारी दोनों दोषी माने जाते हैं. धारा 141 के तहत कंपनी में डायरेक्टर, पार्टनर या अधिकारी जिम्मेदार होते हैं लेकिन अगर वे साबित कर दें कि अपराध उनकी जानकारी के बिना हुआ या उन्होंने रोकने की पूरी कोशिश की तो छूट मिल सकती है. सरकारी नामित पब्लिक कंपनी के डायरेक्टर को छूट मिलती है.
शिकायत कैसे दर्ज कराएं?
चेक पाने वाले को धारा 138 के तहत लिखित शिकायत करनी होती है. ये शिकायत 15 दिन की पेमेंट पीरियड खत्म होने के 1 महीने के अंदर फाइल करनी होती है. कोर्ट सुविधाजनक कारण से देरी माफ कर सकता है. केस मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट या फर्स्ट क्लास ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के पास जाता है. धारा 142ए के तहत एक ही व्यक्ति के खिलाफ अलग-अलग जगहों पर कई केस होने पर एक कोर्ट में ट्रांसफर हो सकते हैं ताकि फैसला एक जैसा रहे.
ट्रायल आमतौर पर समरी ट्रायल से होता है ताकि जल्दी निपट जाए और 6 महीने में खत्म हो सके. समरी ट्रायल में ज्यादा से ज्यादा 1 साल की सजा और जुर्माना हो सकता है लेकिन जरूरत पड़ने पर रेगुलर ट्रायल में बदला जा सकता है. कोर्ट में चेक जारी करने वाले पर बोझ होता है कि वो निर्दोष है ये साबित करे. धारा 139, 146 और 140 के तहत कोर्ट मानता है कि चेक वैध कर्ज या दायित्व के लिए जारी हुआ था जब तक आरोपी साबित न करे. बैंक का मेमो या स्लिप मुख्य सबूत होता है.
क्या होता है इंटरिम कंपेंसेशन ?
धारा 143ए के तहत कोर्ट आरोपी से चेक अमाउंट का 20 फीसदी तक इंटरिम कंपेंसेशन देने का आदेश दे सकता है. ये चार्ज फ्रेम होने पर या समरी ट्रायल में ट्रायल शुरू होने पर दिया जा सकता है. ये 60 दिन में पे करना होता है और सुविधाजनक कारण से 30 दिन और बढ़ सकता है. अगर आरोपी बाद में बरी हो जाता है तो शिकायतकर्ता को ये अमाउंट ब्याज समेत लौटाना पड़ता है, ब्याज आरबीआई बैंक रेट के हिसाब से. ये अमाउंट क्रिमिनल प्रोसीजर कोड की धारा 421 के तहत जुर्माने की तरह रिकवर किया जा सकता है. ये प्रावधान 2018 के संशोधन से आया है ताकि शिकायतकर्ता को जल्दी राहत मिले और चेक की विश्वसनीयता बनी रहे.
ये नियम इसलिए हैं ताकि चेक से पेमेंट की विश्वसनीयता बनी रहे और लोग बेवजह चेक बाउंस न करें. व्यापार में चेक का इस्तेमाल बहुत होता है इसलिए कानून सख्त है. ये कानून दोनों पक्षों को न्याय देने की कोशिश करता है और अपराध को रोकने पर ज्यादा जोर देता है.
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