Salary Slip: हर महीने मिलने वाली सैलरी स्लिप सिर्फ सैलरी बताने का कागज नहीं होती, बल्कि इसमें टैक्स बचत के कई मौके छिपे होते हैं. अगर इन्हें सही तरीके से समझ लिया जाए तो हजारों रुपये का टैक्स बचाया जा सकता है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि सिर्फ कमाई और कटौती देखकर संतुष्ट नहीं होना चाहिए, बल्कि स्लिप के हर हिस्से को ध्यान से समझना जरूरी है. सैलरी स्लिप में दिखने वाले सभी अलाउंस टैक्स फ्री नहीं होते. एचआरए, एलटीए, स्पेशल अलाउंस या कन्वीनियंस अलाउंस जैसी मदों पर टैक्स छूट शर्तों के साथ मिलती है.
जैसे हाउस रेंट अलाउंस एचआरए लीव ट्रैवल अलाउंस एलटीए स्पेशल अलाउंस या कन्वीनियंस अलाउंस दिखते हैं लेकिन इनकी छूट शर्तों पर निर्भर करती है. एचआरए की छूट तभी मिलती है जब आप किराए का घर ले रहे हों और सही दस्तावेज हों वरना पूरा अमाउंट टैक्सेबल हो जाता है. एलटीए की छूट भी असल यात्रा पर मिलती है और वो भी चार साल के ब्लॉक में दो बार भारत में ट्रैवल करने पर.
फॉर्म 16 या आईटीआर में नंबर दिखे तो ज्यादा टैक्स भरना पड़ेगा
अगर दस्तावेज नहीं तो ये भी टैक्स में जुड़ जाता है. दूसरी महत्वपूर्ण बात ये है कि आपकी टेक होम सैलरी और टैक्सेबल इनकम अलग अलग होती है. स्लिप में जो नेट पे दिखता है वो डिडक्शन के बाद का है लेकिन टैक्सेबल इनकम में कंपनी की ओर से पीएफ में ज्यादा योगदान अगर सात लाख पचास हजार से ऊपर हो तो वो टैक्सेबल हो जाता है. साथ ही कंपनी कार रेंट फ्री घर फ्री मील्स जैसे पर्क्स और बोनस जो अभी नहीं मिले लेकिन मिलने वाले हैं वो भी टैक्स में जुड़ते हैं. इसलिए फॉर्म 16 या आईटीआर में नंबर अलग दिखते हैं और टैक्स ज्यादा लग सकता है.
ईपीएफ टीडीएस और प्रोफेशनल टैक्स
तीसरी बात ये कि स्लिप पर सिर्फ अनिवार्य डिडक्शन जैसे ईपीएफ टीडीएस और प्रोफेशनल टैक्स दिखते हैं लेकिन टैक्स बचाने वाली कई इनवेस्टमेंट्स और डिडक्शन नहीं दिखते. जैसे पीपीएफ ईएलएसएस लाइफ इंश्योरेंस बच्चों की ट्यूशन फीस हेल्थ इंश्योरेंस होम लोन इंटरेस्ट या डोनेशन ये सब सेक्शन 80सी 80डी 24बी 80जी के तहत टैक्स कम करते हैं लेकिन इनके लिए आपको एचआर को दस्तावेज जमा करने पड़ते हैं. अगर समय पर नहीं जमा किए तो छूट नहीं मिलती. चौथी बात टीडीएस फाइनल टैक्स नहीं होता. स्लिप पर जो टीडीएस कटा दिखता है वो सिर्फ एडवांस टैक्स है.
इनकम एग्जेम्प्शन और डिडक्शन
असल टैक्स आईटीआर फाइल करते समय तय होता है जब सारी इनकम एग्जेम्प्शन और डिडक्शन जोड़ते हैं. कई बार रिफंड मिल जाता है या थोड़ा और टैक्स भरना पड़ता है. इसलिए आईटीआर सही से भरना जरूरी है. पांचवीं बात ये कि स्लिप पर ओल्ड और न्यू टैक्स रिजीम का चुनाव साफ नहीं दिखता. ओल्ड रिजीम में ज्यादा एग्जेम्प्शन और डिडक्शन मिलते हैं जबकि न्यू में रेट कम लेकिन कम छूट. साल की शुरुआत में चुनाव करते समय अगर सही कंपेयर नहीं किया तो ज्यादा टैक्स देना पड़ सकता है. जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, सैलरी स्लिप सिर्फ कमाई और डिडक्शन दिखाती है लेकिन टैक्स इम्प्लिकेशन छिपे रहते हैं. इन्हें समझकर सैलरी स्ट्रक्चर बेहतर बनाएं दस्तावेज समय पर जमा करें और रिजीम सही चुनें तो टैक्स में बड़ी बचत हो सकती है. ये छोटी-छोटी बातें समझने से आपकी जेब मजबूत बनेगी और टैक्स प्लानिंग आसान हो जाएगी.
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