हमले के बाद रिफाइनरी परिसर में छोटी आग लगी, जिसे जल्द काबू में कर लिया गया. एहतियात के तौर पर संचालन अस्थायी रूप से रोका गया, हालांकि किसी बड़े नुकसान या जनहानि की सूचना नहीं है. यह घटना अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच जारी क्षेत्रीय तनाव की पृष्ठभूमि में हुई है, जिसके कारण समुद्री मार्गों, खासकर स्ट्रेट ऑफ होर्मूज (Strait of Hormuz) में जहाजों की आवाजाही पर भी असर देखने को मिल रहा है.
भारत पर क्या होगा असर
सबसे बड़ा असर कीमतों पर
हमले के बाद वैश्विक बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में 10 से 13 प्रतिशत तक उछाल दर्ज किया गया और दाम 80 से 82 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गए. यह बढ़ोतरी सीधे सप्लाई रुकने से ज्यादा जियोपॉलिटिकल रिस्क के कारण है.
भारत अपनी कुल जरूरत का 85 से 90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है. अनुमान है कि कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी से भारत के इंपोर्ट बिल पर 15 से 20 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है. अगर कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहीं तो पेट्रोल और डीजल 5 से 10 रुपये प्रति लीटर तक महंगे हो सकते हैं. इससे ट्रांसपोर्ट, खाद्य और मैन्युफैक्चरिंग लागत बढ़ेगी और महंगाई पर दबाव आएगा.
सप्लाई पर सीधा असर फिलहाल सीमित
भारत सऊदी अरब से मुख्य रूप से कच्चा तेल आयात करता है, न कि प्रोसेस्ड पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स. रास तनूरा एक रिफाइनरी है, जबकि क्रूड प्रोडक्शन फील्ड्स और बड़े एक्सपोर्ट टर्मिनल्स पर सीधा असर नहीं पड़ा है.
सऊदी अरब के पास अन्य निर्यात मार्ग और टर्मिनल भी हैं और उसका कुल उत्पादन अभी जारी है. भारत की घरेलू रिफाइनरियां, जैसे रिलायंस जामनगर और आईओसीएल की इकाइयां, आयातित कच्चे तेल को देश में ही प्रोसेस करती हैं. इसलिए फिलहाल सीधी सप्लाई शॉर्टेज की आशंका कम मानी जा रही है.
बड़ा खतरा कब
स्थिति तब गंभीर हो सकती है अगर हमले कच्चे तेल के उत्पादन केंद्रों या लोडिंग टर्मिनलों तक फैलते हैं, या फिर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पूरी तरह बंद हो जाता है. यह समुद्री मार्ग दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल और भारत के लगभग आधे क्रूड आयात का रास्ता है. भारत के पास करीब 74 दिनों के रणनीतिक भंडार मौजूद हैं और उसने रूस सहित अन्य देशों से आयात बढ़ाकर सप्लाई स्रोतों में विविधता भी लाई है.
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