ओडिशा हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि पारिवारिक लाभ या पेंशन के दावे केवल उन्हीं रिश्तों के आधार पर किए जा सकते हैं जो कानूनी रूप से वैध हों. बिना कानूनी तलाक के किया गया दूसरा विवाह शून्य माना जाएगा और ऐसी स्थिति में दूसरी पत्नी किसी भी सरकारी लाभ की वैधानिक उत्तराधिकारी नहीं हो सकती.
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अपीलकर्ता का विवाह द्विविवाह (Bigamy) की श्रेणी में आता है. हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 17 और भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 495 के तहत यह एक दंडनीय अपराध है. खंडपीठ ने कहा, “हिंदुओं में एकपत्नीवाद मूल नियम है, जिसमें किसी भी प्रकार का अपवाद नहीं है. पहले विवाह के अस्तित्व में रहते हुए दूसरा विवाह करना कानून की मूल भावना के विपरीत है.”
यह था मामला
यह मामला एक दिवंगत सरकारी कर्मचारी की दूसरी पत्नी से जुड़ा है. स्कूल एवं जन शिक्षा विभाग ने 12 नवंबर 2021 को महिला की पेंशन अर्जी को इस आधार पर खारिज कर दिया था कि कर्मचारी ने अपनी पहली पत्नी के जीवित रहते हुए दूसरा विवाह किया था. इस निर्णय के खिलाफ महिला ने पहले एकल पीठ का दरवाजा खटखटाया, जिसने जुलाई 2025 में विभाग के फैसले को सही ठहराया. इसके बाद महिला ने खंडपीठ में अपील दायर की थी.
अवैधता को इनाम नहीं दे सकते
निःसंतानता को नहीं माना वैध आधार
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई थी कि कर्मचारी ने दूसरा विवाह इसलिए किया क्योंकि उसकी पहली पत्नी से कोई संतान नहीं थी. अदालत ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए इसे “अत्यंत खतरनाक” करार दिया. हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून किसी भी व्यक्ति को निःसंतान होने के आधार पर पहली शादी के रहते हुए दूसरी शादी करने की अनुमति नहीं देता.
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