ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका के प्रस्तावित समझौते ने वैश्विक बाजारों में एक बार फिर चिंता बढ़ा दी है. निवेशक सौदे की साफ तस्वीर का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन अधूरी जानकारी से अस्थिरता बनी हुई है. विशेषज्ञों का मानना है कि सुरक्षा, खनिज संसाधन और टैरिफ जैसे मुद्दे बाजारों को आगे भी प्रभावित कर सकते हैं.
अधूरी जानकारी से बढ़ी बाजार की बेचैनी
रिपोर्ट में कहा गया है कि निवेशक सौदे के बारीक पहलुओं को समझने का इंतजार कर रहे हैं. माना जा रहा है कि यह समझौता 1951 में अमेरिका और डेनमार्क के बीच हुए सुरक्षा करार के अपडेट जैसा हो सकता है. हालांकि, अभी तक यह साफ नहीं है कि नया ढांचा किस रूप में सामने आएगा. बैंक ऑफ बड़ौदा की अर्थशास्त्री अदिति गुप्ता के मुताबिक, आगे की बातचीत में ग्रीनलैंड में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी, खनिज संसाधनों के इस्तेमाल और संप्रभुता जैसे संवेदनशील मुद्दे शामिल होंगे, जो बातचीत को जटिल बना सकते हैं.
सुरक्षा बनाम खनिज संसाधनों की लड़ाई
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड में दिलचस्पी को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ा है, लेकिन रिपोर्ट बताती है कि असल आकर्षण वहां छिपे विशाल खनिज संसाधन भी हैं. ग्रीनलैंड में तेल, गैस और रेयर अर्थ एलिमेंट्स जैसे कीमती संसाधनों की संभावना है, जिन पर अमेरिका की नजर है. यही कारण है कि यह मुद्दा सिर्फ कूटनीतिक नहीं, बल्कि रणनीतिक और आर्थिक भी बन गया है. विशेषज्ञों का मानना है कि संसाधनों की इस दौड़ ने वैश्विक राजनीति में नया तनाव पैदा किया है.
टैरिफ और सैन्य तनाव से और उलझा मामला
अमेरिका और नाटो के बीच फ्रेमवर्क डील की घोषणा से कुछ समय के लिए निवेशकों को राहत जरूर मिली, लेकिन सौदे का स्वरूप अब भी धुंधला है. ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड को लेकर आक्रामक बयानबाजी और यूरोपीय देशों पर आर्थिक दबाव की धमकी के बाद हालात बिगड़ गए थे. इसके जवाब में फ्रांस, जर्मनी और स्वीडन जैसे देशों ने ग्रीनलैंड में सैन्य तैनाती बढ़ा दी. इतना ही नहीं, ट्रंप ने फरवरी 2026 से कई यूरोपीय देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने की घोषणा की थी, जिसे बाद में दावोस में नरम कर दिया गया. इन घटनाओं ने मिलकर बाजारों में अस्थिरता को और गहरा कर दिया है.
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Rakesh Singh is a chief sub editor with 14 years of experience in media and publication. International affairs, Politics and agriculture are area of Interest. Many articles written by Rakesh Singh published in …और पढ़ें
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