FTA Benifit or Loss : यूपीए सरकार ने साल 2013 में एक समझौता किया था, जिसे एफटीए के नाम से जाना जाता है. वित्तमंत्री ने आरोप लगाया है कि इस समझौते से भारतीय किसानों पर बुरा असर पड़ता और पीडीएस योजना को भी ठीक से लागू नहीं किया जा सकता था. बाद में साल 2014 में मोदी सरकार ने इसके नियमों में बदलाव किया और डब्ल्यूटीओ से साफ कह दिया कि बिना खाद्य सुरक्षा पर सहमति बने इस पर एग्रीमेंट पर आगे नहीं बढ़ेंगे.
साल 2013 में हुए टीएफए से किसानों पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है.
सबसे पहले बात करते हैं कि ट्रेड फेसिलिटेशन एग्रीमेंट यानी टीएफए आखिर है क्या. यह समझौता विश्व व्यापार संगठन की ओर से दिसंबर, 2013 में बाली मिनिस्ट्रियल कॉन्फ्रेंस के दौरान हुआ था. साल 1995 में डब्ल्यूटीओ बनने के बाद यह पहला बहुपक्षीय व्यापार समझौता था. तब बताया गया था कि इसका मकसद सीमा शुल्क प्रक्रियाओं को सरल बनाना और कागजी कार्रवाई को कम करके पारदर्शिता बढ़ाना था. माना जा रहा था कि इस समझौते से विश्व व्यापार की लागत करीब 15 फीसदी कम हो जाएगी. इससे ग्लोबल ट्रेड में 1 ट्रिलियन डॉलर की बढ़ोतरी और लाखों नौकरियां पैदा होने का अनुमान था.
इससे क्या नुकसान होने वाला था
टीएफए से भारतीय निर्यात में उछाल आने की संभावना जताई गई थी, जिसका फायदा भी मिला है. लेकिन, इस समझौते में सबसे ज्यादा आशंका खाद्य सुरक्षा को लेकर जताई जा रही थी. टीएफए में कुछ नियम ऐसे भी थे, जो भारतीय किसानों के लिए सब्सिडी का रास्ता बंद कर सकते थे. इसी आशंका को लेकर भारत ने इस समझौते को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया था. खासकर छोटे किसानों को इससे ज्यादा नुकसान होने की आशंका थी. इसमें एमएसपी और पीडीएस जैसी योजनाओं पर भी असर पड़ने की आशंका थी.
किसानों पर क्या असर होता
अगर यह टीएफए पूर्व की शर्तों के साथ ही लागू हो जाता तो किसानों पर असर पड़ने की आशंका थी. टीएफए में ऐसे नियम थे, जो किसानों के लिए न्यूनतम समर्थित मूल्य यानी एमएसपी तय करने में बाधा बन सकते थे. साथ ही पीडीएस के जरिये गरीबों को बांटे जाने वाले अनाज पर भी यह प्रतिकूल असर डाल सकता था. इसमें शामिल पीस क्लॉज की वजह से एमएसपी और पीडीएस जैसी पहल प्रभावित हो सकती थी, जिससे किसानों के साथ गरीबों पर भी असर पड़ता.
मोदी सरकार ने क्या किए बदलाव
मई, 2014 में भाजपा की अगुवाई में एनडीए ने सरकार बनाई और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने, तब तक इस पर सहमति बन चुकी थी. यूपीए सरकार ने टीएफए अपनाने की दिशा में काम भी शुरू कर दिया था और जुलाई, 2014 तक इसका प्रोटोकॉल तैयार करने की डेडलाइन थी. इससे ठीक पहले जुलाई में मोदी सरकार ने इसमें बड़ा बदलाव कर दिया. तब मोदी सरकार ने साफ कर दिया कि खाद्य सुरक्षा और सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानी पीडीएस पर स्थायी समाधान न मिलने तक टीएफए पर आगे नहीं बढ़ा जाएगा. इसी के साथ भारत ने डब्ल्यूटीओ को बता दिया कि फिलहाल टीएफए प्रोटोकॉल को टाला जा रहा है.
यूपीए से अलग था मोदी सरकार का रिएक्शन
इससे पहले यूपीए सरकार टीएफए पर आगे बढ़ चुकी थी, लेकिन मोदी सरकार का स्टैंड इससे पूरी तरह अलग था. पुराने समझौते पर भारत को 4 साल का पीस क्लॉज दिया गया था, लेकिन मोदी सरकार ने इसे अपर्याप्त माना और साफ कहा कि पहले इस मुद्दे पर सहमति बनानी होगी. इसके बाद समझौते को रोक दिया गया. डब्ल्यूटीओ ने भारत की खाद्य सुरक्षा की बात स्वीकार की, तब जाकर अप्रैल, 2016 में इस समझौते पर सहमति बनी. इस समझौते के बाद एमएसपी पर अनाज खरीद और पीडीएस जैसी योजना से खाद्य सुरक्षा उपलब्ध कराने का रास्ता साफ हुआ.
टीएफए से भारत को क्या फायदा हुआ
- साल 2016 में जब टीएफए लागू हो गया तो भारतीय निर्यातकों खासकर एमएसएमई को खास फायदा हुआ.
- निर्यात आसान और सस्ता हो गया, जिससे लागत कम और कस्टम क्लीयरेंस में भी सुधार हुआ.
- भारत का निर्यात बढ़ने पर ग्लोबल वैल्यू चेन में भागीदारी भी बेहतर हो गई.
- विदेशी निवेश में इजाफा और ट्रेड कॉस्ट 15 फीसदी कम होने से विकासशील देशों को ज्यादा लाभ.
- भारत ने बाद में एफटीए के हिसाब से ट्रेड सिस्टम को अपडेट किया, जिससे लॉजिस्टिक्स में सुधार हुआ और फायदा निर्यातकों के साथ-साथ उत्पादकों को भी मिला.
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प्रमोद कुमार तिवारी को शेयर बाजार, इन्वेस्टमेंट टिप्स, टैक्स और पर्सनल फाइनेंस कवर करना पसंद है. जटिल विषयों को बड़ी सहजता से समझाते हैं. अखबारों में पर्सनल फाइनेंस पर दर्जनों कॉलम भी लिख चुके हैं. पत्रकारि…और पढ़ें
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