शुक्रवार, 27 फरवरी 2026 क जब युद्ध की सुगबुगाहट तेज थी तब सोना 5,244 डॉलर प्रति औंस पर खड़ा था. लेकिन युद्ध शुरू होने के कुछ दिन बाद, 6 मार्च तक यह गिरकर 5,120 डॉलर के करीब आ गया. यह गिरावट न केवल हैरान करने वाली है, क्योंकि हर कोई यही सोच रहा था कि अब सोना बारूद की गंध पाकर फिर से रॉकेट बनेगा.
क्या यह सिर्फ ‘कंसोलिडेशन’ है?
फाइनेंशियल एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2025 में सोने ने निवेशकों को मालामाल कर दिया था. सोने की कीमम में 65% उछाल आया. 2026 की शुरुआत भी धमाकेदार रही और साल के शुरुआती हफ्तों में ही यह 20% से अधिक चढ़ गया. 28 जनवरी 2026 को सोना 5,418 डॉलर के अपने सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया था. इस शिखर को छूने के बाद से सोना थका नजरर आने लगा. बाजार जानकार इसे “कंसोलिडेशन फेज” कह रहे हैं. सरल शब्दों में कहें तो, सोना अपनी अगली बड़ी छलांग लगाने से पहले एक सीमित दायरे में सुस्ता रहा है. लेकिन युद्ध के दौरान इस सुस्ती का गिरावट में बदल जाना ‘खतरे की घंटी’ जैसा है. युद्ध के चौथे दिन, यानी मंगलवार को बाजार में जबरदस्त उथल-पुथल हुई और सोना 4% टूट गया, जबकि चांदी की कीमतों में 10% की भारी गिरावट दर्ज की गई.
सोने को गिराने में डॉलर का रोल
जब दुनिया संकट में होती है, तो निवेश के दो सबसे बड़े सुरक्षित ठिकाने होते हैं. पहला, सोना. दूसरा, अमेरिकी डॉलर. आमतौर पर इन दोनों के बीच छत्तीस का आंकड़ा ही रहता है. इस युद्ध ने डॉलर को सोने से ज्यादा मजबूत साबित कर दिया है. अमेरिकी डॉलर इंडेक्स रॉकेट की रफ्तार से बढ़ रहा है. जनवरी 2025 में यह इंडेक्स 102 पर था. जून 2025 तक यह गिरकर 96.70 के स्तर पर आ गया था. लेकिन पिछले 30 दिनों में इसने पलटी मारी और 1.46% की बढ़त हासिल की है.
युद्ध शुरू होने के महज 5 दिनों के भीतर इसमें 1.49% की तेजी आई है. जब डॉलर मजबूत होता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना महंगा हो जाता है, जिससे इसकी मांग घटती है. आईएमएफ के प्रथम उप-प्रबंध निदेशक डैन काट्ज़ का कहनाह है कि डॉलर आज भी अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक प्रणाली का दिल है. संकट के समय दुनिया ने सोने से ज्यादा डॉलर की नकदी (Cash) पर भरोसा जताया है.
लिक्विडिटी का पेंच
युद्ध के समय एक और दिलचस्प पहलू सामने आया है नकदी की जरूरत (Liquidity Demand). मध्य-पूर्व में तनाव के कारण ब्रेंट क्रूड20% से अधिक महंगा हो गया है. चूंकि कच्चे तेल का व्यापार डॉलर में होता है, इसलिए देशों और बड़ी कंपनियों को तेल खरीदने के लिए भारी मात्रा में डॉलर की जरूरत पड़ रही है. इस नकदी की कमी को पूरा करने के लिए निवेशक और संस्थान अपने पास मौजूद सोने को बेचकर डॉलर जुटा रहे हैं. यही वजह है कि सुरक्षित निवेश होने के बावजूद सोने पर ‘सेलिंग प्रेशर’ बना हुआ है.
सोने की चमक कम होने के पीछे अमेरिका के केंद्रीय बैंक, फेडरल रिजर्व की नीतियों का भी बड़ा हाथ है. युद्ध से पहले उम्मीद थी कि 2026 में ब्याज दरों में कम से कम दो बार कटौती होगी. कम ब्याज दरें सोने के लिए बूस्टर का काम करती हैं. लेकिन अब युद्ध के कारण तेल की कीमतें बढ़ गई हैं, जिससे महंगाई (Inflation) का खतरा फिर से मंडराने लगा है. अगर महंगाई बढ़ती है, तो फेडरल रिजर्व ब्याज दरों को कम करने के बजाय उन्हें ऊंचा बनाए रखेगा. इसे अर्थशास्त्र की भाषा में ‘हाइयर फॉर लॉन्गर’ की नीति कहा जाता है. ऊंची ब्याज दरों के कारण निवेशक सोने के बजाय अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड में पैसा लगाना बेहतर समझ रहे हैं.
केंद्रीय बैंकों ने भी खींचा हाथ
सोने की कीमतों को पिछले तीन साल से जो सबसे बड़ा सहारा मिल रहा था, वह था केंद्रीय बैंकों की अंधाधुंध खरीदारी. लेकिन अब वहां भी सुस्ती दिख रही है. वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (WGC) के अनुसार, 2025 में सोने की कुल मांग पहली बार 5,000 टन के पार गई थी. साल 2025 में केंद्रीय बैंक हर महीने औसतन 27 टन सोना खरीद रहे थे. लेकिन जनवरी 2026 में यह आंकड़ा गिरकर केवल 5 टन रह गया है.
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