ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर कीमतें स्थिर नहीं रहतीं. वे बाजार की मांग, ग्राहकों की एक्टिविटी और कंपीटिशन के आधार पर लगातार बदलती रहती हैं. आइए समझते हैं कि ऐसा क्यों होता है.
डायनेमिक प्राइसिंग
ई-कॉमर्स कंपनियां “डायनेमिक प्राइसिंग” मॉडल का इस्तेमाल करती हैं. इसका मतलब है कि किसी उत्पाद की कीमत मांग और सप्लाई के हिसाब से रियल-टाइम में बदलती रहती है. अगर किसी प्रोडक्ट की मांग अचानक बढ़ जाती है, जैसे त्योहारों, सेल सीजन या किसी ट्रेंड के दौरान, तो उसकी कीमत बढ़ सकती है. वहीं, अगर स्टॉक ज्यादा है और खरीदार कम हैं, तो कंपनियां कीमत घटाकर बिक्री बढ़ाने की कोशिश करती हैं.
एयरलाइन टिकट और होटल बुकिंग में तो यह मॉडल लंबे समय से चलता आ रहा है, लेकिन अब ऑनलाइन शॉपिंग में भी यह आम हो चुका है.
आपकी ब्राउज़िंग का असर
कई बार आपने नोटिस किया होगा कि जिस सामान को आप बार-बार देख रहे हैं, उसकी कीमत बाद में बढ़ी हुई नजर आती है. ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि वेबसाइट आपके ब्राउज़िंग व्यवहार को ट्रैक करती है. अगर सिस्टम को लगता है कि आप किसी खास प्रोडक्ट में दिलचस्पी दिखा रहे हैं, तो वह अनुमान लगा सकता है कि आप उसे खरीदने वाले हैं, और कीमत थोड़ी बढ़ा दी जाती है.
हालांकि हर प्लेटफॉर्म ऐसा करता हो, यह जरूरी नहीं. लेकिन पर्सनलाइज्ड प्राइसिंग की तकनीक अब तेजी से बढ़ रही है.
ऑनलाइन शॉपिंग में पर्सनलाइज्ड प्राइसिंग का मतलब है अलग-अलग ग्राहकों को एक ही सामान अलग-अलग कीमत पर बेचना. ई-कॉमर्स कंपनियां आपके डेटा जैसे कि आपकी ब्राउज़िंग हिस्ट्री, लोकेशन, आपका डिवाइस (फोन या लैपटॉप), और आपकी पिछली खरीदारी, का विश्लेषण करके यह अनुमान लगाती हैं कि आप किसी सामान के लिए कितने पैसे चुकाने को तैयार हैं. उसी आधार पर वे आपकी स्क्रीन पर कीमत दिखाती हैं. यह अब आसानी से संभव है कि महंगे फोन वालों को कीमत महंगी दिखे.
उदाहरण के तौर पर मान लीजिए आप और आपका दोस्त एक ही वेबसाइट पर एक ही फ्लाइट का टिकट देख रहे हैं. चूंकि आपने महंगे स्मार्टफोन से सर्च किया है और पहले भी कई बार फ्लाइट बुक की है, तो कंपनी आपको टिकट ₹6,000 में दिखा सकती है. वहीं, आपके दोस्त को, जो पहली बार एक साधारण फोन से सर्च कर रहा है, वही टिकट लुभाने के लिए ₹5,000 में दिख सकती है.
कंपीटिशन और ऑफर की रणनीति
ऑनलाइन मार्केटप्लेस पर एक ही प्रोडक्ट कई विक्रेता बेचते हैं. ऐसे में कीमतें कंपीटिशन के चलते बदलती रहती हैं. अगर किसी एक विक्रेता ने दाम घटाए, तो दूसरे भी पीछे नहीं रहते. इसके अलावा फ्लैश सेल, कूपन, बैंक ऑफर और कैशबैक जैसी स्कीमें भी कीमतों को अस्थायी रूप से कम या ज्यादा दिखा सकती हैं. कई बार कंपनियां पहले कीमत थोड़ी बढ़ाती हैं और फिर डिस्काउंट दिखाकर उसे कम करती हैं, ताकि ग्राहकों को ज्यादा बचत का एहसास हो.
टैक्स, लॉजिस्टिक्स और अन्य खर्च
ऑनलाइन कीमतें केवल मांग पर निर्भर नहीं करतीं. इसमें टैक्स, डिलीवरी चार्ज, वेयरहाउसिंग खर्च और आयात शुल्क जैसी कई लागतें जुड़ी होती हैं. अलग-अलग शहरों या राज्यों में टैक्स अलग होने से भी अंतिम कीमत में फर्क पड़ सकता है.
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