अगर आप भी किसी इंस्टैंट या प्री-अप्रूव्ड लोन मैसेज को देखकर अप्लाई करने की सोच रहे हैं, तो इन 5 जरूरी बातों को समझना आपके लिए बेहद जरूरी है.
1. ‘प्री-अप्रूव्ड’ का मतलब ‘गारंटी’ नहीं
कंपनियां अक्सर मार्केटिंग के लिए प्री-अप्रूव्ड लोन का मैसेज भेजती हैं. इसका मतलब यह नहीं है कि आपको बिना किसी जांच के लोन मिल जाएगा. यह पूरी तरह आपकी क्रेडिट हिस्ट्री और फाइनल वेरिफिकेशन पर निर्भर करता है. कई बार यह सिर्फ आपको ऐप डाउनलोड कराने का एक तरीका होता है.
2. APR पर दें ध्यान
बैंकों का पर्सनल लोन आमतौर पर 10% से 24% सालाना होता है. लेकिन डिजिटल ऐप्स में प्रोसेसिंग फीस (1% से 3%), कन्वीनिएंस चार्ज और भारी पेनल्टी शामिल होती है. एक्सपर्ट्स के अनुसार, लोन लेते समय सिर्फ EMI न देखें, बल्कि एनुअल परसेंटेज रेट (APR) देखें, जो लोन की वास्तविक सालाना लागत बताता है.
3. RBI से रजिस्ट्रेशन की जांच करें
बाजार में कई ऐसे अनऑथराइज्ड ऐप्स हैं जो आरबीआई के साथ रजिस्टर्ड नहीं हैं. ये ऐप्स न केवल आपसे ज्यादा वसूली करते हैं, बल्कि आपके फोन के डेटा (कॉन्टैक्ट्स और गैलरी) का गलत इस्तेमाल भी कर सकते हैं. हमेशा सुनिश्चित करें कि ऐप किसी बैंक या रजिस्टर्ड NBFC से जुड़ा हो.
4. CIBIL स्कोर पर असर
आसानी से मिलने वाले इन छोटे-छोटे लोन को बार-बार लेने या इनकी किश्त चुकाने में देरी करने से आपका क्रेडिट स्कोर खराब हो सकता है. एक बार सिबिल खराब हुआ, तो भविष्य में आपको होम लोन या बिजनेस के लिए बड़ा लोन मिलने में भारी परेशानी होगी.
5. ‘की फैक्ट स्टेटमेंट’ की मांग करें
आरबीआई के नियमों के अनुसार, हर डिजिटल लेंडर्स को ग्राहक को एक ‘की फैक्ट स्टेटमेंट’ (KFS) देना जरूरी है. इसमें लोन से जुड़े सभी खर्च और शर्तें साफ-साफ लिखी होनी चाहिए. अगर कोई ऐप यह जानकारी छिपा रहा है, तो समझ लीजिए कि वहां खतरा है.
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