1. ब्याज खत्म नहीं होता, बस छिप जाता है
सच तो यह है कि बैंक अपना ब्याज नहीं छोड़ता. होता यह है कि दुकानदार आपको प्रोडक्ट पर मिलने वाला डिस्काउंट सीधे न देकर, उस पैसे को बैंक के ब्याज में एडजस्ट कर देता है यानी जो सामान आपको कैश में सस्ता मिल सकता था, उसे आप EMI के चक्कर में पूरी कीमत पर खरीदते हैं.
2. प्रोसेसिंग फीस और GST का झटका
भले ही ब्याज ‘जीरो’ दिखे, लेकिन बैंक आपसे प्रोसेसिंग फीस वसूलते हैं. यह आमतौर पर सामान की कीमत का 1% से 3% तक हो सकती है. इसके अलावा छिपे हुए ब्याज वाले हिस्से पर आपको 18% जीएसटी भी देना पड़ता है, जो हर महीने आपके क्रेडिट कार्ड बिल में जुड़कर आता है.
3. ‘कैश डिस्काउंट’ का नुकसान
मान लीजिए एक फोन 60,000 रुपये का है. अगर आप तुरंत पूरा पेमेंट करें, तो शायद वह आपको 55,000 रुपये में मिल जाए. लेकिन No-Cost EMI चुनते ही दुकानदार वह 5,000 रुपये का डिस्काउंट हटा देता है यानी आपने बिना ब्याज के नाम पर असल में 5,000 रुपये ज्यादा चुकाने होते हैं.
4. क्रेडिट कार्ड की लिमिट हो जाती है ब्लॉक
अगर आपके कार्ड की लिमिट 1 लाख रुपये है और आपने 40,000 रुपये का सामान EMI पर लिया, तो आपकी खर्च करने की क्षमता तुरंत घटकर 60,000 रुपये रह जाएगी. भले ही आप छोटी किश्तें दे रहे हों, लेकिन बैंक पूरी रकम को आपकी लिमिट से ब्लॉक कर देता है.
5. प्री-पेमेंट पर जुर्माना
अगर आपके पास बीच में पैसे आ जाएं और आप अपना लोन जल्दी बंद करना चाहें, तो बैंक आपसे प्री-पेमेंट पर चार्ज वसूल सकता है. ऐसे में जो फायदा आपको शुरू में दिख रहा था, वह जुर्माने में बदल जाता है.
स्कैम नहीं, मार्केटिंग का अच्छा ट्रिक
NO-Cost EMI स्कैम नहीं है, लेकिन ये मार्केटिंग का अच्छा ट्रिक है. मार्केटिंग तभी काम करती है, जब हम शर्तें पढ़े बिना ‘Buy Now’ पर क्लिक कर दें.
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