कंपाउंडिंग का सीधा मतलब है “ब्याज पर ब्याज” मिलना. यानी आपने जो पैसा निवेश किया है, उस पर मिलने वाला रिटर्न भी आगे जाकर कमाई करता है. इसी वजह से जितना लंबा समय निवेश में रहता है, उतना ज्यादा फायदा होता है. शुरुआत में ग्रोथ धीमी दिखती है, लेकिन समय के साथ रिटर्न तेजी से बढ़ने लगता है.
₹6,000 की मासिक SIP से कब बन सकता है ₹1 करोड़
अगर कोई निवेशक हर महीने करीब ₹6,000 की SIP करता है और उसे औसतन 12–15 प्रतिशत सालाना रिटर्न मिलता है, तो लंबे समय में यह रकम बड़ी हो सकती है. हालांकि विशेषज्ञों के मुताबिक 12 प्रतिशत रिटर्न के हिसाब से यह निवेश लगभग 20 साल में करीब ₹50-55 लाख तक पहुंच सकता है. अगर रिटर्न 15 प्रतिशत के आसपास रहे तो लगभग दो दशक में यह ₹1 करोड़ के करीब भी पहुंच सकता है.
अगर कोई व्यक्ति हर महीने ₹10,000 की SIP करता है और लगभग 12 प्रतिशत सालाना रिटर्न मिलता है, तो करीब 20 साल में यह निवेश लगभग ₹1 करोड़ का फंड बना सकता है. इस दौरान कुल निवेश करीब ₹26.4 लाख होता है, जबकि बाकी रकम कंपाउंडिंग से मिलने वाले रिटर्न से बनती है.
₹14,000 मासिक निवेश से लक्ष्य जल्दी
अगर निवेश की रकम बढ़ाकर ₹14,000 प्रति माह कर दी जाए तो ₹1 करोड़ का लक्ष्य और जल्दी हासिल किया जा सकता है. ज्यादा निवेश का मतलब है कि कंपाउंडिंग को ज्यादा पूंजी मिलती है और फंड तेजी से बढ़ता है. इसलिए निवेश बढ़ाने या हर साल SIP में थोड़ा-थोड़ा इजाफा करने से लक्ष्य जल्दी पूरा हो सकता है.
जल्दी शुरुआत क्यों है जरूरी?
ईटी की रिपोर्ट के अनुसार, फाइनेंशियल एडवाइजर के मुताबकि, हमेशा सलाह देते हैं कि निवेश जितना जल्दी शुरू किया जाए उतना अच्छा है. अगर कोई व्यक्ति 25 साल की उम्र में SIP शुरू करता है तो उसे कंपाउंडिंग का फायदा कई दशकों तक मिलता है. वहीं अगर कोई 35 या 40 साल की उम्र में शुरुआत करता है तो उसी लक्ष्य को पाने के लिए ज्यादा पैसा निवेश करना पड़ सकता है. कंपाउंडिंग का फायदा तभी मिलता है जब निवेशक लंबे समय तक निवेश बनाए रखे. बाजार में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं, लेकिन नियमित निवेश और धैर्य रखने से ही बड़ा फंड बनता है.
₹6,000, ₹10,000 या ₹14,000 जैसी छोटी-छोटी मासिक SIP भी समय के साथ बड़ा फंड बना सकती है. कंपाउंडिंग का असली जादू लंबी अवधि में दिखता है. इसलिए अगर लक्ष्य ₹1 करोड़ का कॉर्पस बनाना है, तो जल्दी शुरुआत करना, नियमित निवेश करना और लंबे समय तक निवेश बनाए रखना सबसे जरूरी है.
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