बैंक सबसे पहले उम्र देखते हैं. युवा आवेदक (जैसे 25-40 साल) को ज्यादा फायदा मिलता है, क्योंकि उनके पास कमाने के ज्यादा साल होते हैं. ऐसे में लोन की अवधि लंबी (20-30 साल) हो सकती है और EMI कम पड़ती है. अगर उम्र ज्यादा है (जैसे 50+), तो बैंक चिंतित होते हैं कि रिटायरमेंट के बाद EMI कैसे चुकाई जाएगी या बिजनेस कमजोर पड़ सकता है. इसलिए लोन अमाउंट कम या अवधि छोटी मिलती है. उम्र जितनी कम होती है लोन उतना आसानी से मिलने की संभावना होती है.
बैंक क्या-क्या चेक करता है?
सेल्फ-एम्प्लॉयड लोगों के लिए डॉक्यूमेंट्स बहुत अहम हैं. बैंक पिछले 2-3 साल के इनकम टैक्स रिटर्न (ITR), प्रॉफिट-लॉस स्टेटमेंट, बैलेंस शीट और बैंक स्टेटमेंट मांगते हैं. ये दिखाते हैं कि बिजनेस कितना स्थिर है और आय कितनी नियमित आ रही है. अगर दस्तावेज मजबूत हैं और आय में बढ़ोतरी दिख रही है, तो लोन अप्रूवल की संभावना बहुत बढ़ जाती है. अधूरे दस्तावेज से एप्लीकेशन रिजेक्शन हो सकता है.
बैंक सिर्फ ग्रॉस इनकम नहीं, बल्कि नेट इनकम (खर्च घटाने के बाद बचा पैसा) देखते हैं. बिजनेस के खर्च, टैक्स आदि घटाकर जो बचता है, वही EMI के लिए उपलब्ध माना जाता है. अगर नेट इनकम अच्छी है और EMI का 40-50% से कम है, तो लोन आसानी से मिलता है. कम नेट इनकम पर लोन अमाउंट कम या ब्याज दर ज्यादा हो सकती है.
क्रेडिट स्कोर भी होता है चेक
क्रेडिट स्कोर (CIBIL स्कोर, 300-900 के बीच) बैंक के लिए बहुत जरूरी है. हाई स्कोर (750+) वाला व्यक्ति समय पर पेमेंट करता दिखता है, इसलिए लोन जल्दी और कम ब्याज पर मिलता है. लो स्कोर पर रिजेक्शन या हाई इंटरेस्ट रेट लग सकता है. पिछले लोन या क्रेडिट कार्ड की अच्छी हिस्ट्री से स्कोर मजबूत होता है.
अगर बिजनेस के अलावा किराया, निवेश, प्रॉपर्टी से आय आ रही है, तो बैंक इसे प्लस पॉइंट मानते हैं. कई आय स्रोत होने से रिस्क कम लगता है. अगर एक स्रोत कमजोर पड़े तो दूसरा सहारा देता है. इससे लोन अप्रूवल आसान होता है और बेहतर शर्तें मिलती हैं. बैंक अब डिजिटल तरीके से भी जांच करते हैं, जैसे GST रिटर्न और बैंक स्टेटमेंट से कैश फ्लो देखते हैं. अगर सब सही डॉक्यूमेंट्स निकलते हैं, तो घर का सपना पूरा हो सकता है.
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