रिटर्न नहीं, बचत पर रखें फोकस
अगर रिटायरमेंट में सिर्फ 12-15 साल बचे हैं, तो सबसे बड़ा हथियार ऊंचा रिटर्न नहीं, बल्कि ज्यादा बचत है. बाजार कब ऊपर जाएगा और कब गिरेगा, यह कोई नहीं जानता. लेकिन आप हर महीने कितना बचाते हैं, यह आपके हाथ में है. अपनी सैलरी से अधिक हिस्सा बचाने की आदत डालें. यदि आप Employees’ Provident Fund Organisation के तहत कवर हैं, तो 12 फीसदी से ज्यादा कटौती के लिए अनुरोध कर सकते हैं. इसके अलावा सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) शुरू करें या संतुलित हाइब्रिड फंड में निवेश करें, जहां 70-80 फीसदी डेट और 20-30 फीसदी इक्विटी हो. नेशनल पेंशन सिस्टम भी अच्छा विकल्प है, क्योंकि इसमें टैक्स लाभ के साथ लॉक-इन की सुविधा है, जिससे समय से पहले पैसा निकालने का लालच कम होता है.
ज्यादा जोखिम से बचना जरूरी
कई लोग देर से शुरुआत की भरपाई के लिए बड़े और जोखिम भरे दांव लगाते हैं. यह रणनीति अक्सर उलटी पड़ जाती है. रिटायरमेंट प्लानिंग कोई टी-20 मैच नहीं है, जहां आखिरी ओवर में बड़े शॉट मारकर लक्ष्य हासिल किया जाए. कम जोखिम वाले निवेश साधन भले कम रिटर्न दें, लेकिन स्थिरता देते हैं. फिर भी पूरी तरह इक्विटी से दूरी न बनाएं. पोर्टफोलियो का 10-15 फीसदी हिस्सा बड़े और स्थिर शेयरों या कम लागत वाले ETF में रखना समझदारी हो सकती है. इससे लंबे समय में ग्रोथ की संभावना बनी रहती है.
गैर-जरूरी खर्चों पर लगाएं लगाम
अगर बचत कम है तो खर्चों की समीक्षा जरूरी हो जाती है. इसका मतलब यह नहीं कि जीवन का आनंद छोड़ दें, बल्कि फालतू खर्चों को पहचानें. नई कार लेने की जल्दी टाल सकते हैं. बड़ा और महंगा गैजेट खरीदने से पहले दो बार सोचें. मशहूर निवेशक वॉरेन बफे की सलाह याद रखें- आज जो चीज जरूरी नहीं है, उसे खरीदने से कल की जरूरतें खतरे में पड़ सकती हैं. थोड़ी सादगी आज अपनाना, भविष्य की आर्थिक आजादी के लिए फायदेमंद है.
रिटायरमेंट की तारीख आगे बढ़ाने पर करें विचार
अगर गणित अब भी संतोषजनक नहीं लग रहा, तो रिटायरमेंट की उम्र 3-5 साल बढ़ाने पर विचार करें. इससे दो फायदे होंगे- अधिक समय तक बचत और कम समय तक कॉर्पस से खर्च. हालांकि यह तभी संभव है जब सेहत और स्किल्स दोनों साथ दें. अपने क्षेत्र में अपडेट रहें, नेटवर्क मजबूत रखें और शारीरिक फिटनेस पर ध्यान दें. इससे जरूरत पड़ने पर कुछ साल अतिरिक्त काम करने का विकल्प खुला रहेगा.
रिवर्स मॉर्गेज भी हो सकता है सहारा
भारत में कई लोग ‘घर अमीर, नकद गरीब’ की स्थिति में पहुंच जाते हैं. यानी उनके पास घर तो है, लेकिन नियमित आय सीमित है. ऐसे में रिवर्स मॉर्गेज एक विकल्प हो सकता है, जिसमें बैंक आपके घर की वैल्यू के आधार पर आपको मासिक भुगतान करता है. हालांकि भारत में यह विकल्प अभी बहुत लोकप्रिय नहीं है, क्योंकि लोग संपत्ति से भावनात्मक रूप से जुड़े रहते हैं और बैंक भी सीमित ऑफर देते हैं. फिर भी अगर रिटायरमेंट के समय बचत कम रह जाए, तो यह अंतिम सहारा बन सकता है.
सार यह है कि रिटायरमेंट की तैयारी में देर जरूर नुकसान पहुंचाती है, लेकिन सही फैसलों से स्थिति सुधारी जा सकती है. अनुशासन, समझदारी और यथार्थवादी सोच के साथ आप अपनी सुनहरी रिटायरमेंट की राह फिर से बना सकते हैं.
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