क्या आप लाइफ साइकिल फंड में निवेश करने की सोच रहे हैं? सेबी ने इस नई श्रेणी के लिए पहले तीन वर्षों में 3% तक एग्जिट लोड लागू कर दिया है. जानिए यह नियम क्यों लाया गया, किन निवेशकों पर इसका असर पड़ेगा और क्या अब यह फंड सिर्फ लंबी अवधि के लिए ही सही विकल्प है?
यदि आप भविष्य के बड़े लक्ष्यों जैसे रिटायरमेंट या बच्चों की पढ़ाई के लिए नए ‘लाइफ साइकिल फंड’ में निवेश करने की योजना बना रहे हैं, तो अब आपको अपनी लिक्विडिटी (पैसे की उपलब्धता) को लेकर अब पहले से ज्यादा ख्याल रखना होगा. सेबी ने अपने नए सर्कुलर में म्यूचुअल फंड श्रेणियों का पुनर्गठन करते हुए ‘लाइफ साइकिल फंड’ के लिए सख्त एग्जिट लोड नियम लागू कर दिए हैं. इन नियमों का सीधा असर उन निवेशकों पर पड़ेगा जो निवेश के शुरुआती तीन वर्षों के भीतर अपना पैसा निकालने का विकल्प चुनते हैं.
क्या है नया नियम और कितना लगेगा शुल्क?
सेबी के निर्देशानुसार, लाइफ साइकिल फंड में निवेश के बाद निकासी पर ‘ग्रेडेड एग्जिट लोड’ लगाया गया है. इसका उद्देश्य निवेशकों को लंबी अवधि के लिए प्रतिबद्ध बनाना है. आंकड़ों के आईने में देखें तो यह शुल्क आपकी जमा पूंजी पर एक बड़ा प्रभाव डाल सकता है:
- पहले साल के भीतर निकासी: 3% एग्जिट लोड
- दूसरे साल के भीतर निकासी: 2% एग्जिट लोड
- तीसरे साल के भीतर निकासी: 1% एग्जिट लोड
- तीन साल बाद: कोई शुल्क नहीं (जब तक स्कीम में अलग से न कहा जाए)
उदाहरण से समझें
मान लीजिए एक निवेशक ने 10 लाख रुपये का निवेश किया है. यदि किसी आकस्मिक जरूरत के कारण उसे पहले 12 महीनों के भीतर यह फंड बेचना पड़ता है, तो उसे 30,000 रुपये का शुल्क देना होगा. इसी तरह, यदि वह दूसरे वर्ष में निकासी करता है तो उस पर 20,000 रुपये और तीसरे वर्ष में 10,000 रुपये की कटौती होगी. यह शुल्क सीधे निवेशक को मिलने वाली राशि से काट लिया जाएगा, जिससे हाथ में आने वाला पैसा उम्मीद से कम हो सकता है.
निवेशकों के लिए क्या बदल जाएगा?
लाइफ साइकिल फंड अपनी ‘ग्लाइड पाथ’ रणनीति के लिए जाने जाते हैं, जो उम्र बढ़ने के साथ रिस्क (इक्विटी) को कम और सुरक्षा (डेट) को बढ़ाते हैं. सेबी का यह फैसला स्पष्ट करता है कि यह श्रेणी अब उन लोगों के लिए बिल्कुल उपयुक्त नहीं है, जो अल्पकालिक या अपना पैसा ‘पार्किंग’ के लिए निवेश की तलाश में हैं. जो निवेशक अनुशासित रहकर पूरे कार्यकाल तक निवेशित रहते हैं, उन पर इसका कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा. लेकिन, जो निवेशक अपनी बचत का इस्तेमाल आपातकालीन स्थिति में करने की सोच रहे थे, उन्हें अब इस 3 फीसदी तक के संभावित वित्तीय बोझ को अपनी गणना में शामिल करना होगा.
सेबी का यह कदम म्यूचुअल फंड बाजार में ‘सॉल्यूशन ओरिएंटेड’ स्कीमों को अधिक पारदर्शी और लक्ष्य-आधारित बनाने की दिशा में उठाया गया है. निवेशकों के लिए संदेश ये है कि लाइफ साइकिल फंड में पैसा तभी डालें, जब आप कम से कम तीन साल तक उसे न छूने का पक्का इरादा रखते हों. समय से पहले बाहर निकलना अब पहले के मुकाबले काफी महंगा साबित होने वाला है.
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मलखान सिंह पिछले 17 वर्षों से ख़बरों और कॉन्टेंट की दुनिया में हैं. प्रिंट मीडिया से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई नामी संस्थानों का नाम प्रोफाइल में जुड़ा है. लगभग 4 साल से News18Hindi के साथ काम कर रहे …और पढ़ें
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