आरबीआई के हालिया आंकड़ों से पता चलता है कि भारत का घरेलू कर्ज अब जीडीपी का 41 प्रतिशत से ज्यादा हो गया है. ये स्तर कुछ विकसित देशों से कम है, लेकिन बदलाव चिंता की बात है. असुरक्षित खुदरा कर्ज, जैसे पर्सनल लोन और क्रेडिट कार्ड, घर लोन से तेजी से बढ़े हैं. पर्सनल लोन कई लाख करोड़ तक पहुंच गए हैं और क्रेडिट कार्ड बकाया भी बहुत बढ़ा है. युवा कमाने वाले इस बदलाव के बीच में हैं.
युवाओं में कर्ज क्यों बढ़ रहा है?
पहला बड़ा कारण ये है कि अब कर्ज लेना बहुत आसान हो गया है. पहले डॉक्यूमेंट्स और बहुत जांच होती थी, लेकिन अब डिजिटल ऐप्स से कुछ मिनट में लोन मिल जाता है. आधे नए उधार लेने वाले लोग डिजिटल तरीके पसंद करते हैं. मिलेनियल्स और जेन जेड इसमें आगे हैं. पहली सैलरी आने के कुछ महीनों में ही प्री-अप्रूव्ड क्रेडिट कार्ड और लोन ऑफर आने लगते हैं. बाय नाउ पे लेटर जैसे प्लेटफॉर्म से सामान आसानी से खरीद सकते हैं, लेकिन बाद में ब्याज और ईएमआई का बोझ पड़ता है.
दूसरा कारण ये है कि कर्ज आय से ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है. पिछले दो सालों में औसत पर्सनल लोन 23 प्रतिशत बढ़ा है, जबकि बचत कम बढ़ी है. शुरुआती नौकरी के सालों में कर्ज लेने से भविष्य में इमरजेंसी, करियर चेंज या घर-गाड़ी खरीदने की ताकत कम हो जाती है.
तीसरा कारण वित्तीय समझ की कमी है. बहुत से युवा कभी अपना क्रेडिट स्कोर नहीं चेक करते. वे नहीं समझ पाते कि क्रेडिट कार्ड पर सिर्फ मिनिमम पेमेंट करने से ब्याज कितना बढ़ जाता है और ईएमआई कितनी लंबी चलती है. छोटी-छोटी ईएमआई मिलकर हर महीने बड़ा बोझ बन जाती हैं.
साइलेंट डेट के खतरे क्या हैं?
Fydaa के संस्थापक कुंतल भंसाली के अनुसार, क्रेडिट कार्ड पर 90 से 360 दिनों तक ओवरड्यू बढ़ रहा है. असुरक्षित कर्ज में एनपीए यानी नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स का हिस्सा बढ़ रहा है. बैंकिंग सिस्टम अभी मजबूत है, लेकिन शुरुआती चेतावनी साफ दिख रही है. युवाओं के पास कम बचत, कम बफर और आय में उतार-चढ़ाव ज्यादा होता है. छोटे कर्ज भी जमा होकर उनकी फाइनेंशियल ताकत कम कर देते हैं.
ये कर्ज लाइफस्टाइल के खर्च के लिए लिया जाता है, जैसे गैजेट्स, ट्रैवल या पार्टी. संपत्ति बनाने के बजाय खर्च बढ़ाने से भविष्य की आय पहले से बंध जाती है. जो पीढ़ी शुरुआत में ही कर्ज में फंस जाती है, उसके लिए बचत, निवेश और मुश्किल समय झेलना कठिन हो जाता है.
जोखिम कम करने के लिए क्या करें ?
क्रेडिट अच्छा है अगर सही इस्तेमाल हो. घर, एजुकेशन या बिजनेस के लिए लिया जाए तो फायदा होता है. लेकिन आदतन खर्च के लिए लेना खतरा है. व्यक्तिगत स्तर पर हर ईएमआई को समझकर लें. कुल बकाया ट्रैक करें, क्रेडिट स्कोर चेक करें. संस्थाओं को ट्रांसपरेंसी होना चाहिए, जीरो कॉस्ट जैसी बातों में छिपी फीस बतानी चाहिए. सरकार को वित्तीय शिक्षा बढ़ानी चाहिए, खासकर असुरक्षित कर्ज के जोखिम सिखाने चाहिए.
भारत में युवा फोर्स बहुत बड़ा है. डिजिटल क्रेडिट से मौके मिल रहे हैं, लेकिन बैलेंस शीट भी मजबूत रखनी होगी. अगर साइलेंट डेट को समय रहते कंट्रोल किया जाए तो ये मजबूती बनेगा, वरना धीरे-धीरे कमजोरी आएगी. युवाओं को समझदारी से कर्ज लेना चाहिए ताकि भविष्य सुरक्षित रहे.
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