ये फैसला अमेरिकी सोलर कंपनियों की शिकायत पर आया है. ये ग्रुप जुलाई 2025 में पेटिशन दाखिल कर चुका था, जिसमें कहा गया कि चीन की कंपनियां टैरिफ से बचने के लिए इंडिया, इंडोनेशिया और लाओस में प्रोडक्शन शिफ्ट कर रही हैं और सस्ते सोलर बेच रही हैं. अमेरिकी कंपनियां कहती हैं कि इससे उनके निवेश और नौकरियां खतरे में हैं.
किन अमेरिकी कंपनियों की वजह से आई भारतीय सोलर कंपनियों पर मुसीबत?
जिन कंपनियों ने याचिका दाखिल की थी. इन कंपनियों में Alliance for American Solar Manufacturing and Trade के मेंबर्स. इसमें मुख्य रूप से First Solar, Hanwha Qcells (या Qcells), Mission Solar Energy शामिल हैं. इनके अलावा Talon PV Solar Solutions ने भी सपोर्ट किया था. भारतीय सोलर कंपनियों को झटका देने वाली अमेरिकी सोलर कंपनियों के बारे में पहले आपको बताते हैं. फर्स्ट सोलर एक अमेरिकी कंपनी है जो 1999 में शुरू हुई थी. ये कंपनी सोलर पैनल्स बनाती है और अमेरिका की सबसे बड़ी फोटोवोल्टेइक सोलर टेक्नोलॉजी कंपनी मानी जाती है. ये दुनिया की टॉप सोलर मैन्युफैक्चरर्स में से एक है और अमेरिका में हेडक्वार्टर वाली एकमात्र बड़ी कंपनी है. ये कंपनी रिसाइक्लिंग में भी नंबर वन है और सोलर पैनल्स को रिसाइकल करके 90 प्रतिशत से ज्यादा सामान दोबारा इस्तेमाल करती है. फर्स्ट सोलर अमेरिका की सोलर इंडस्ट्री को मजबूत बनाने में बड़ा रोल निभाती है और घरेलू प्रोडक्शन बढ़ाकर नौकरियां पैदा कर रही है.
हन्व्हा क्यूसेल्स (या क्यूसेल्स) एक दक्षिण कोरियाई कंपनी है जो हन्व्हा ग्रुप का हिस्सा है. ये कंपनी 1999 में जर्मनी में क्यू-सेल्स के नाम से शुरू हुई थी और बाद में हन्व्हा ने इसे खरीद लिया. अब ये दुनिया की बड़ी सोलर कंपनियों में से एक है जो हाई-परफॉर्मेंस सोलर सेल्स और मॉड्यूल्स बनाती है. कंपनी का हेडक्वार्टर सियोल में है और अमेरिका, जर्मनी, मलेशिया और कोरिया में मैन्युफैक्चरिंग फैक्टरियां हैं.
इसके अलावा तीसरी कंपनी है मिशन सोलर एनर्जी एक अमेरिकी कंपनी है जो 2014 में शुरू हुई और टेक्सास के सैन एंटोनियो में बेस्ड है. ये हाई-एफिशिएंसी सोलर मॉड्यूल्स बनाती है और रेसिडेंशियल, कमर्शियल और यूटिलिटी-स्केल मार्केट के लिए सॉल्यूशंस देती है. कंपनी OCI होल्डिंग्स की सब्सिडियरी है जो कोरिया की बड़ी ग्रीन एनर्जी कंपनी है.
किन भारतीय सोलर कंपनियों पर पड़ेगा सबसे ज्यादा असर?
भारत की सोलर कंपनियों पर इसका सीधा असर पड़ेगा क्योंकि अमेरिका उनका बड़ा मार्केट है. 2024 में भारत से अमेरिका में 792.6 मिलियन डॉलर का सोलर इंपोर्ट हुआ, जो 2022 से नौ गुना ज्यादा है. अब 126 प्रतिशत ड्यूटी से एक्सपोर्ट बहुत महंगा हो जाएगा और बाजार पर इसका असर देखने को मिलेगा. शुरुआती ड्यूटी लगाने का सीधा असर उन कंपनियों पर पड़ेगा जिनकी अमेरिकी बाजार में निर्यात हिस्सेदारी अधिक है. सबसे ज्यादा असर जिन कंपनियों पर पड़ेगा उनमें वारी एनर्जी लिमिटेड, प्रीमियर एनर्जीज और विक्रम सोलर शामिल हैं. इन कंपनियों पर काउंटरवेलिंग ड्यूटी का असर आज 25 फरवरी को ही देखने को मिल रहा है.
शेयरों में आई गिरावट
वारे एनर्जीज के शेयर 25 फरवरी 2026 को 10 प्रतिशत गिरकर 2721 रुपये पर पहुंच गए. कंपनी का अमेरिका में भी ऑपरेट करती है, वहां मैन्युफैक्चरिंग चल रही है और निवेश बढ़ा रही है. हाल में उसने Meyer Burger को खरीदा है. दिसंबर क्वार्टर में ऑर्डर बुक 60,000 करोड़ रुपये की थी और FY26 में EBITDA 5500 से 6000 करोड़ रुपये होने का भरोसा है. दिसंबर क्वार्टर में ओवरसीज मार्केट से 32.6 प्रतिशत रेवेन्यू आया.
प्रीमियर एनर्जीज के शेयर भी 10 प्रतिशत लोअर सर्किट पर पहुंच गए, 699.35 रुपये पर ट्रेडिंग रुकी. कंपनी का अमेरिका में एक्सपोजर कम है, इसलिए शायद असर थोड़ा कम हो. विक्रम सोलर के शेयर 5.72 प्रतिशत गिरकर 174.79 रुपये पर आए. कंपनी के ऑर्डर बुक का करीब 20 प्रतिशत एक्सपोर्ट से जुड़ा है.
अप्रैल में इन देशों पर लगाई थी एंटी-डंपिंग ड्यूटी
पिछले साल अप्रैल 2025 में जब अमेरिका ने मलेशिया, वियतनाम, थाईलैंड और कंबोडिया पर एंटी-डंपिंग ड्यूटी लगाई थी, तब भारत बाहर था और वारी, प्रीमियर के शेयर बढ़े थे. लेकिन अब भारत भी शामिल हो गया है. ट्रंप प्रशासन की ये पॉलिसी अमेरिकी सोलर इंडस्ट्री को बचाने की है. पहले रेसिप्रोकल टैरिफ सुप्रीम कोर्ट ने रद्द किए थे, फिर 10 प्रतिशत यूनिवर्सल टैरिफ लगाया जो 15 प्रतिशत हो गया. भारतीय सोलर कंपनियां अब अमेरिका के अलावा अन्य मार्केट्स या लोकल प्रोडक्शन पर फोकस कर सकती हैं. वारी जैसी कंपनियां अमेरिका में फैक्ट्री बढ़ा रही हैं, जिससे कुछ फायदा हो सकता है. स्टॉक मार्केट में मची हलचल से ये इशारा साफ हो रहा है कि ये ड्यूटी भारतीय सोलर एक्सपोर्ट के लिए एक बड़ी चुनौती बनने वाली है.
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