वैसे कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में यह दावा किया जा रहा है कि निर्मला सीतारमण अपने बजट भाषण में रूस के साथ स्टील्थ फाइटर जेट सुखोई-57 (SU-57 Fighter Jets) के सौदे लेकर कुछ ऐलान कर सकती हैं, लेकिन ऐसा कुछ नहीं होने वाला क्योंकि बजट के दौरान सिर्फ संबंधित क्षेत्रों के लिए फंड आवंटित किया जाता है.
फाइटर जेट्स या किसी भी बड़े हथियार की खरीद की प्रक्रिया काफी पेचीदा और लंबी होती है. इसे समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि बजट और रक्षा मंत्रालय की भूमिकाएं क्या हैं. आमतौर पर, वित्त मंत्री बजट में फाइटर जेट्स की खरीद का सीधा ऐलान नहीं करतीं, बल्कि रक्षा मंत्रालय के लिए एक एकमुश्त फंड (Budgetary Allocation) आवंटित करती हैं.
1. वित्त मंत्री की भूमिका: बजट एलोकेशन
बजट भाषण में वित्त मंत्री यह बताती हैं कि इस साल रक्षा मंत्रालय (MoD) को कुल कितना पैसा दिया गया है.
कैपिटल आउटले (Capital Outlay): बजट में एक हिस्सा ‘कैपिटल आउटले’ के लिए होता है. यही वह पैसा है जिससे नए फाइटर जेट्स, मिसाइलें या पनडुब्बियां खरीदी जाती हैं.
घोषणा का तरीका: वित्त मंत्री आमतौर पर कहती हैं, ‘हमने रक्षा आधुनिकीकरण के लिए ₹1.5 लाख करोड़ आवंटित किए हैं.’ वह यह नहीं बतातीं कि इसमें से कितने राफेल या कितने तेजस खरीदे जाएंगे.
2. रक्षा मंत्रालय (MoD) की भूमिका: खरीद का ऐलान
हथियारों की खरीद का असली ऐलान और प्रक्रिया रक्षा मंत्रालय के स्तर पर होती है.
DAC की मंजूरी: रक्षा अधिग्रहण परिषद (Defence Acquisition Council – DAC), जिसकी अध्यक्षता रक्षा मंत्री करते हैं, तय करती है कि कौन सा फाइटर जेट खरीदना है.
ऐलान कब होता है: जब DAC किसी सौदे को ‘Acceptance of Necessity’ (AoN) दे देती है, तब रक्षा मंत्रालय इसका ऐलान करता है. यह साल के किसी भी समय हो सकता है, बजट के दिन होना जरूरी नहीं है.
CCS की अंतिम मुहर: सबसे बड़े सौदों (जैसे 114 राफेल की डील) के लिए ‘कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी’ (CCS) की मंजूरी चाहिए होती है, जिसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते हैं.
3. बजट में कब होती है चर्चा?
कभी-कभी बजट के दस्तावेजों (Pink Book या Expenditure Profile) में यह संकेत मिलता है कि पैसा किन पुराने सौदों की किश्तें चुकाने में जा रहा है या नए प्रोजेक्ट्स के लिए कितना ‘टोकन अमाउंट’ रखा गया है.
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