भारतीय बाजार में किसी समय कोडेक, नोकिया और एचएमटी जैसे ब्रांड्स का ऐसा जादू था कि इनके बिना जीवन की कल्पना करना मुश्किल था. लेकिन समय के साथ कदम न मिला पाने की एक छोटी सी चूक इन दिग्गजों के लिए इतनी भारी पड़ी कि आज इनका साम्राज्य पूरी तरह खत्म हो चुका है. इन कंपनियों का पतन इस बात का जीता-जागता प्रमाण है कि अगर आप बदलाव को स्वीकार नहीं करते, तो मार्केट आपको बाहर का रास्ता दिखाने में देर नहीं लगाता.
1. कोडेक: कोडेक ने ही दुनिया का पहला डिजिटल कैमरा बनाया था, लेकिन उन्होंने इसे दुनिया से छिपाकर रखा ताकि उनका रील और फिल्म रॉल बेचने का मुनाफा कम न हो. कंपनी को डर था कि अगर लोग डिजिटल फोटो खींचने लगेंगे तो उनकी रील कौन खरीदेगा. जब तक उन्होंने बाजार की मांग को समझा और डिजिटल की तरफ मुड़े, तब तक सोनी और कैनन जैसे ब्रांड्स ने मार्केट पर कब्जा कर लिया था और कोडेक का नाम रील के साथ ही इतिहास बन गया.

2. नोकिया: एक समय ऐसा था जब भारत के हर दूसरे हाथ में नोकिया का फोन होता था, लेकिन स्मार्टफोन के दौर में उन्होंने एंड्रॉइड जैसे आसान सॉफ्टवेयर के बजाय विंडोज को चुनकर अपनी कब्र खुद खोद ली. नोकिया ने यह मानने से इनकार कर दिया कि लोग अब केवल मजबूत फोन नहीं बल्कि ढेर सारे ऐप्स वाला एक छोटा कंप्यूटर अपनी जेब में चाहते हैं. जब तक उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ, सैमसंग और चीनी ब्रांड्स ने बाजार छीन लिया था.

3. एचएमटी: ‘देश की धड़कन’ कही जाने वाली इस कंपनी ने भारतीयों को वक्त देखना सिखाया, लेकिन खुद वक्त के साथ नहीं बदल पाई. जब दुनिया में सेल से चलने वाली क्वार्ट्ज घड़ियां आईं, तो एचएमटी पुरानी चाबी भरने वाली तकनीक और सरकारी सुस्ती में फंसी रही. टाइटन जैसे नए ब्रांड्स ने स्टाइलिश और आधुनिक घड़ियों के साथ युवाओं को अपनी ओर खींच लिया और एचएमटी सिर्फ बुजुर्गों की पसंद बनकर रह गई.
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4. एम्बेसडर: दशकों तक लाल बत्ती और नेताओं की पहचान रही इस कार ने अपनी मजबूती के अहंकार में 50 सालों तक अपने लुक और फीचर्स में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया. एम्बेसडर के पास मौका था कि वह आधुनिक इंजन और बेहतर इंटीरियर लाती, लेकिन उसने पुरानी लकीर ही पीटी. जैसे ही मारुति और हुंडई ने आरामदायक और ज्यादा माइलेज वाली गाड़ियां उतारीं, एम्बेसडर का भारी-भरकम डिजाइन भारतीय सड़कों पर बोझ बन गया.

5. याहू: इंटरनेट की शुरुआत में याहू सबसे बड़ा नाम था, लेकिन इसकी सबसे बड़ी गलती गूगल और फेसबुक जैसी उभरती कंपनियों को खरीदने के सुनहरे मौके गंवाना रही. याहू ने एक साथ बहुत सारी चीजें (सर्च, मेल, न्यूज, शॉपिंग) बनने की कोशिश की और किसी एक में भी मास्टर नहीं बन पाया. अंत में गूगल सर्च और जीमेल की सादगी और रफ्तार ने याहू को पूरी तरह किनारे कर दिया.

6. वीडियोकॉन: भारतीय घरों में टीवी और फ्रिज का मतलब वीडियोकॉन होता था, लेकिन कंपनी ने अपने सफल बिजनेस पर ध्यान देने के बजाय टेलिकॉम और तेल जैसे अनजाने क्षेत्रों में भारी कर्ज लेकर हाथ डाला. जब सैमसंग और एलजी जैसी विदेशी कंपनियों ने आधुनिक तकनीक और बेहतर सर्विस पेश की, तो कर्ज में डूबा वीडियोकॉन नए इनोवेशन नहीं कर पाया और धीरे-धीरे बाजार से बाहर हो गया.

7. ब्लैकबेरी: प्रोफेशनल और अमीर लोगों का स्टेटस सिंबल बना ब्लैकबेरी अपने कीपैड के मोह में इतना अंधा हो गया कि उसने टचस्क्रीन की लहर को मजाक समझा. उन्हें लगा कि बिजनेस क्लास के लोग हमेशा बटन दबाना ही पसंद करेंगे और उनकी प्राइवेसी सबसे सुरक्षित है. लेकिन आईफोन की बड़ी स्क्रीन और आसान ऐप्स ने लोगों की पसंद बदल दी और ब्लैकबेरी का सुरक्षित कीपैड किसी के काम का नहीं रहा.

8. कोडेक, नोकिया, याहू, एचएमटी, एम्बेसडर, वीडियोकॉन और ब्लैकबेरी का भारतीय बाजार से गायब होना बिजनेस जगत के लिए सबसे बड़ी चेतावनी है. इन कंपनियों ने या तो आने वाले तकनीकी बदलावों को हल्के में लिया या फिर अपनी पुरानी सफलता के अहंकार में इनोवेशन करना बंद कर दिया. जहां कोडेक और एचएमटी तकनीक के मामले में पीछे रह गए, वहीं नोकिया और एम्बेसडर ने ग्राहकों की बदलती जरूरतों को नहीं समझा. आज ये ब्रांड्स एक सबक हैं कि मार्केट में टिके रहने के लिए केवल साख नहीं, बल्कि निरंतर बदलाव और भविष्य की सोच जरूरी है.
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