भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच हुए ऐतिहासिक व्यापार समझौते में सरकार ने भारतीय किसानों के हितों की पूरी सुरक्षा की है. यूरोपीय संघ के व्यापार प्रमुख मारोस सेफकोविच ने स्पष्ट किया है कि भारत की ‘रेड लाइंस’ (संवेदनशील क्षेत्र) का पूरी तरह सम्मान किया गया है. इसका मतलब है कि डेयरी, पोल्ट्री और कुछ चुनिंदा कृषि उत्पादों जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को इस समझौते से बाहर रखा गया है, ताकि विदेशी प्रतिस्पर्धा से हमारे ग्रामीण और कृषि क्षेत्र को कोई नुकसान न हो.
यूरोपीय संघ के व्यापार आयुक्त मारोस सेफकोविच ने सीएनबीसी टीवी18 के साथ एक खास इंटरव्यू में इस ऐतिहासिक समझौते की बारीकियों को साझा किया है. उन्होंने बताया कि यह डील केवल टैरिफ कम करने के बारे में नहीं है, बल्कि दोनों पक्षों की लंबी अवधि की आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए है. समझौते के तहत भारत और ईयू के बीच लगभग 96-97% व्यापारिक वस्तुओं पर टैक्स की पाबंदियां हटा दी गई हैं. सेफकोविच ने इस पूरी प्रक्रिया में केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के साथ अपनी व्यक्तिगत दोस्ती का भी जिक्र किया और बताया कि जब भी दोनों देशों की टीमें किसी मुद्दे पर अटकती थीं, तो उन्होंने और गोयल ने मिलकर दोस्ती के स्तर पर समाधान निकाले.
खेती और डेयरी: सुरक्षित रही ‘लक्ष्मण रेखा’
भारतीय किसानों के लिए यह खबर राहत भरी है कि सरकार ने संवेदनशील मुद्दों पर कोई समझौता नहीं किया है:
- पूरी तरह बाहर (Out of Deal): गेहूं, चावल, मक्का और पूरा डेयरी सेक्टर (दूध, पनीर आदि) इस समझौते का हिस्सा नहीं हैं. इन पर कोई ड्यूटी कम नहीं होगी.
मारोस सेफकोविच ने कहा, “भारत की कृषि पर ‘रेड लाइन्स’ का पूरा सम्मान किया गया है. जो भारत और यूरोप दोनों के लिए संवेदनशील है, उसे बाहर रखा गया है.”
एग्रीकल्चर को इतना सपोर्ट क्यों?
भारत के लिए खेती केवल जीडीपी का एक हिस्सा नहीं, बल्कि देश की सामाजिक और आर्थिक रीढ़ है, जिसे अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों में खुला छोड़ना किसी बड़े जोखिम से कम नहीं होगा. भारत की लगभग 50% आबादी अपनी रोजी-रोटी के लिए खेती पर निर्भर है और इनमें से ज्यादातर छोटे किसान हैं जिनके पास आधुनिक तकनीक और मोटी सब्सिडी का अभाव है. यदि भारत कृषि क्षेत्र को पूरी तरह विदेशी होड़ के लिए खोल देता है, तो विकसित देशों के भारी सब्सिडी वाले सस्ते उत्पादों के सामने भारतीय किसान टिक नहीं पाएंगे, जिससे न केवल ग्रामीण गरीबी बढ़ेगी बल्कि देश की खाद्य आत्मनिर्भरता भी खतरे में पड़ जाएगी.
कपड़ा, जूता और वाइन: किसे क्या मिला?
- लेबर-इंटेंसिव सेक्टर: भारत के कपड़ा (Textiles), जूते (Footwear) और अन्य श्रम-केंद्रित क्षेत्रों को डील के पहले दिन से ही यूरोप में बिना किसी टैक्स और कोटे के एंट्री मिलेगी.
- वाइन और स्पिरिट्स: प्रीमियम यूरोपीय वाइन पर ड्यूटी 150% से घटकर 20% रह जाएगी, जबकि स्पिरिट्स पर यह 40% होगी. जैतून का तेल (Olive oil) और प्रोसेस्ड फूड पर ड्यूटी जीरो कर दी जाएगी.
- स्टील सेक्टर: भारतीय स्टील कंपनियों को यूरोप के सुरक्षात्मक उपायों (Safeguard measures) के बीच भी ‘प्रिविलेज्ड एक्सेस’ मिलेगा, जिससे उनका निर्यात प्रभावित नहीं हो.
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जय ठाकुर 2018 से खबरों की दुनिया से जुड़े हुए हैं. 2022 से News18Hindi में सीनियर सब एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं और बिजनेस टीम का हिस्सा हैं. बिजनेस, विशेषकर शेयर बाजार से जुड़ी खबरों में रुचि है. इसके अलावा दे…और पढ़ें
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