शेयर बाजारों में गिरावट
पिछले हफ्ते वैश्विक शेयर बाजारों में बड़ी गिरावट देखने को मिली. अमेरिका का S&P 500 करीब 2 प्रतिशत गिरा, जबकि यूरोपीय बाजारों में लगभग 5.5 प्रतिशत और जापान को छोड़कर एशिया-प्रशांत क्षेत्र में करीब 6.3 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई. बॉन्ड मार्केट भी दबाव में रहा. ब्रिटेन के दो साल के गिल्ट यील्ड में लगभग 50 बेसिस पॉइंट की तेज बढ़ोतरी हुई, जो 2022 के बाद सबसे खराब स्थिति मानी जा रही है. जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया में भी यील्ड 30 बेसिस पॉइंट से अधिक बढ़ी, जबकि अमेरिका में यह बढ़ोतरी करीब 13 बेसिस पॉइंट रही. इसके साथ ही महंगाई की उम्मीदें भी बढ़ रही हैं. ब्रिटेन में पांच साल का ब्रेकईवन रेट बढ़कर 3.5 प्रतिशत पर पहुंच गया है, जो फरवरी के अंत की तुलना में लगभग 28 बेसिस पॉइंट ज्यादा है.
ग्लोबल GDP में गिरावट से बढ़ेगी ब्याज दर
इस स्थिति ने केंद्रीय बैंकों के सामने नई दुविधा खड़ी कर दी है. कैपिटल इकोनॉमिक्स के अनुसार तेल की कीमतों में हर 5 प्रतिशत की बढ़ोतरी विकसित अर्थव्यवस्थाओं में महंगाई को लगभग 0.1 प्रतिशत अंक बढ़ा देती है. वहीं अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का अनुमान है कि अगर तेल की कीमतों में स्थायी रूप से 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी होती है तो वैश्विक जीडीपी में 0.1 से 0.2 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है. ऐसे हालात में यूरोपियन सेंट्रल बैंक इस साल कम से कम एक बार ब्याज दर बढ़ा सकता है, जबकि पहले दरों में कटौती की संभावना जताई जा रही थी. बैंक ऑफ इंग्लैंड के लिए भी यही दबाव बन सकता है. शिकागो फेड के चेयर ऑस्टन गूल्सबी ने इसे सबसे असहज स्टैगफ्लेशन जैसी स्थिति बताया है.
1970 में लगा था इस तरह का शॉक
अगर मिडिल ईस्ट में तनाव और बढ़ता है, खासकर ईरान को लेकर अमेरिका और इजरायल के बीच टकराव लंबा खिंचता है, तो तेल की कीमतें 120 से 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं. 1970 के दशक में भी इसी तरह के ऑयल शॉक ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिला दिया था. विश्लेषकों का कहना है कि अगर होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते तेल आपूर्ति प्रभावित हुई तो अमेरिका पर असर अपेक्षाकृत कम पड़ेगा, क्योंकि वह तेल और कुछ अन्य संसाधनों में काफी हद तक आत्मनिर्भर है. लेकिन यूरोप और एशिया के कई देशों को महंगाई की नई लहर का सामना करना पड़ सकता है.
सबसे चिंताजनक स्थिति तब बन सकती है जब आर्थिक मंदी और तेज महंगाई साथ-साथ बढ़ें. इतिहास बताता है कि बड़े तेल झटकों ने कई बार मंदी को जन्म दिया है, जैसे 1973, 1980, 1990 और 2008 में हुआ था. अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक 100 डॉलर से ऊपर बनी रहती हैं तो निवेशक सोने जैसे सुरक्षित निवेश की ओर बढ़ सकते हैं, जबकि शेयर और बॉन्ड बाजार दबाव में आ सकते हैं. हालांकि अगर युद्ध जल्दी खत्म हो जाए और ओपेक प्लस देश तेल की आपूर्ति बढ़ा दें, तो हालात कुछ हद तक संभल सकते हैं.
आम लोगों के जीवन पर असर
इस संकट का असर केवल वित्तीय बाजारों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर भी पड़ेगा. तेल की कीमत बढ़ने से पेट्रोल और डीजल महंगे होंगे, जिससे परिवहन, खाद्य पदार्थ और बिजली की लागत भी बढ़ेगी. भारत जैसे देशों में, जहां करीब 80 प्रतिशत कच्चा तेल आयात किया जाता है, ईंधन बिल 20 से 30 प्रतिशत तक बढ़ सकता है. दुनिया के कई देशों ने इसके असर को देखते हुए कदम उठाने शुरू कर दिए हैं. उदाहरण के तौर पर वियतनाम ने ईंधन बचाने के लिए वर्क-फ्रॉम-होम को बढ़ावा दिया है, जबकि मिस्र ने घरेलू ईंधन की कीमतों में लगभग 17 प्रतिशत की बढ़ोतरी कर दी है. ऐसे में यह साफ है कि तेल की कीमतों में उछाल केवल बाजार की खबर नहीं, बल्कि हर घर के बजट को प्रभावित करने वाली बड़ी आर्थिक कहानी बन सकती है.
नौकरियां खतरे में, स्थिति को संभालना आसान नहीं
अमेरिका और यूरोप में आर्थिक हालात को लेकर चिंता बढ़ती दिखाई दे रही है. अमेरिका में फरवरी महीने में उम्मीद से ज्यादा नौकरियां जाने की खबर आई है, जबकि यूरोप में ऑटोमोबाइल और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर दबाव बढ़ गया है. महंगाई की वजह से किराया, राशन और मेडिकल खर्च लगातार बढ़ रहे हैं, जिससे एक सामान्य परिवार का मासिक खर्च करीब 10–15 प्रतिशत तक बढ़ सकता है. इसका सबसे ज्यादा असर गरीब तबके पर पड़ने की आशंका है, क्योंकि ऊर्जा की कीमतें बढ़ने से हीटिंग और कूलिंग महंगी हो जाती हैं और इससे स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं भी बढ़ सकती हैं. सोसाइटी जनरल के अर्थशास्त्री किट जक्स का मानना है कि अमेरिका राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बावजूद इस स्थिति को संभाल सकता है, लेकिन यूरोप और ब्रिटेन के लिए जीवनयापन की लागत काफी ज्यादा बढ़ सकती है.
विशेषज्ञों का कहना है कि इस कठिन दौर से निकलने का रास्ता आसान नहीं है. कमर्जबैंक के अर्थशास्त्री रेनर गुंटरमैन के मुताबिक अगर तेल की कीमतें कम होती हैं, तभी ब्याज दरों में बढ़ोतरी रुक सकती है. लेकिन अगर दुनिया स्टैगफ्लेशन की स्थिति में फंस गई, यानी महंगाई ऊंची रहे और आर्थिक वृद्धि रुक जाए, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था 1–2 प्रतिशत तक सिकुड़ सकती है. इस स्थिति में अमेरिका पर असर अपेक्षाकृत कम हो सकता है, लेकिन यूरोप को ऊर्जा की जरूरत पूरी करने के लिए ज्यादा LNG आयात करना पड़ेगा, जो और महंगा साबित होगा.
कुल मिलाकर यह संकट सिर्फ भू-राजनीतिक नहीं बल्कि आर्थिक भी है. सरकारें फिलहाल राहत देने के लिए सब्सिडी बढ़ा सकती हैं, लेकिन यह लंबे समय तक टिकाऊ समाधान नहीं होगा. विशेषज्ञ निवेशकों को सलाह दे रहे हैं कि वे अपने निवेश को अलग-अलग क्षेत्रों में बांटें और महंगाई से जुड़े एसेट्स पर ध्यान रखें. अब सबकी नजर तेल की कीमतों और शांति वार्ताओं पर है. अगर हालात नहीं सुधरे, तो दुनिया पर वैश्विक मंदी का खतरा और गहरा सकता है.
Discover more from Business News
Subscribe to get the latest posts sent to your email.