भारत पहले भी अमेरिकी कृषि उत्पादों पर ड्यूटी कम कर चुका है, जैसे ब्लूबेरी और क्रैनबेरी पर 2024 में टैक्स घटाया गया था. लेकिन ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और यूरोपीय संघ के साथ हुए हालिया ट्रेड समझौतों में भारत ने डेयरी, गेहूं, चीनी और सेब जैसे संवेदनशील सेक्टर को बचाकर रखा था. अब अमेरिका के मामले में तस्वीर कुछ अलग दिख रही है.
अमेरिका से आने वाले कृषि उत्पाद, किसानों पर दबाव
संयुक्त बयान के मुताबिक, भारत अमेरिकी सूखे अनाज, सोयाबीन तेल, मेवे, फल, वाइन और शराब जैसे कई उत्पादों पर टैक्स घटाएगा. इसमें सूखे डिस्टिलर्स ग्रेन यानी डीडीजीएस भी शामिल है, जो पशु चारे में इस्तेमाल होता है.
भारत में डीडीजीएस का उत्पादन तेजी से बढ़ा है और इसकी कीमत करीब 24,000 से 27,000 रुपये प्रति टन है. अमेरिका से आने वाला डीडीजीएस लगभग 27,000 रुपये प्रति टन पड़ सकता है और इसकी गुणवत्ता ज्यादा स्थिर मानी जाती है. इससे भारतीय डिस्टिलरी और मक्का किसानों पर दबाव बढ़ सकता है क्योंकि सस्ता और बेहतर विदेशी माल घरेलू बाजार में आ सकता है.
सोयाबीन तेल और किसानों पर असर
सोयाबीन तेल पर टैक्स घटने से भारत के लिए अमेरिका से आयात सस्ता हो सकता है. अभी भारत ज्यादातर सोयाबीन तेल अर्जेंटीना और ब्राजील से मंगाता है. अगर अमेरिकी तेल सस्ता हुआ तो आयात का रुख अमेरिका की ओर जा सकता है. इसका असर भारतीय सोयाबीन किसानों की कीमतों पर पड़ सकता है.
लाल ज्वार और अनाज बाजार का खतरा
अमेरिका का लाल ज्वार भी भारत में आने की संभावना है. अभी भारत सफेद ज्वार उगाता है. अगर लाल ज्वार सस्ता पड़ा तो पोल्ट्री और पशु आहार उद्योग मक्का की जगह इसका इस्तेमाल कर सकता है. इससे मक्का और सोयाबीन की कीमतें दबाव में आ सकती हैं.
आम आदमी को क्या फायदा मिलेगा
इस डील से आम उपभोक्ताओं को कुछ फायदे भी मिल सकते हैं. सोयाबीन तेल, मेवे, फल और शराब जैसे उत्पाद सस्ते हो सकते हैं. अमीर उपभोक्ताओं के लिए एवोकाडो, ब्लूबेरी और क्रैनबेरी जैसे प्रीमियम फल सुलभ हो सकते हैं. शराब पर ड्यूटी घटने से विदेशी शराब भी सस्ती हो सकती है.
लेकिन किसानों के लिए बड़ा जोखिम
इस डील का सबसे बड़ा खतरा किसानों के लिए है. विदेशी अनाज, तेल और पशु चारा सस्ता आने से भारतीय किसानों की फसल की कीमतें गिर सकती हैं. इससे खेती की आय घटने का खतरा है. खासकर मक्का, सोयाबीन और पशुपालन से जुड़े किसानों पर इसका असर ज्यादा हो सकता है.
भारत की ट्रेड डील का बड़ा गणित
इस डील के तहत अमेरिका भारत से अगले पांच साल में 500 अरब डॉलर के ऊर्जा और अन्य उत्पाद खरीदने की उम्मीद कर रहा है. अगर आयात तेजी से बढ़ा और निर्यात नहीं बढ़ा तो भारत के भुगतान संतुलन पर भी दबाव पड़ सकता है.
आखिरी बात
अमेरिका के साथ ट्रेड डील से आम लोगों को सस्ता तेल, फल और शराब मिल सकती है, लेकिन इसकी कीमत भारतीय किसान चुका सकते हैं. आने वाले समय में सरकार को किसानों की सुरक्षा और घरेलू कृषि बाजार को बचाने के लिए मजबूत नीति बनानी होगी, वरना सस्ती विदेशी खेती भारतीय खेती के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है.
(यह लेख मौलिक रूप से सिराज हुसैन और गरिमा जैन ने मनीकंट्रोल के लिए अंग्रेजी में लिखा है. जिसका यहां मोटे तौर अनुवाद किया गया है. सिराज हुसैन पूर्व कृषि सचिव हैं. गरिमा जैन ग्लोबल कमोडिटी फर्म्स में लीडरशिप पोजिशन में रह चुकी हैं. यह लेखकों के निजी विचार हैं.)
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