इसे समझने के लिए आपको हाल ही में बने क्षेत्रीय समीकरणों को समझना होगा. पहले हम आपको इस हमले के मुख्य कारणों को पॉइंट्स में बताते हैं, फिर हम आपको उसे विस्तार से भी जानकारी देंगे.
हमले के मुख्य कारण
- ट्रू प्रॉमिस 4: ईरान ने True Promise 4 के तहत आरामको की Ras Tanura रिफाइनरी पर हमला कर सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देशों पर कूटनीतिक दबाव बनाने की कोशिश की है.
- सऊदी-अमेरिका-इजराइल गठजोड़: ईरान का आरोप है कि सऊदी और इजराइल ने मिलकर अमेरिका से उस पर हमला करवाया है, जिससे नाराज होकर ईरान ने तेल बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया.
- सैन्य अड्डों का इस्तेमाल: ईरान का सीधा संदेश है कि जो खाड़ी देश अमेरिका को अपनी जमीन और हवाई क्षेत्र इस्तेमाल करने देंगे, उन्हें भी इस युद्ध का सक्रिय हिस्सा माना जाएगा.
अमेरिकी अख़बार वॉशिंगटन पोस्ट (Washington Post) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के खिलाफ सख्त कदम उठाने के लिए इजराइल और सऊदी अरब ने मिलकर अमेरिकी प्रशासन पर दबाव बनाया था. पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) के कार्यकाल के दौरान ईरान के खिलाफ जो सैन्य कार्रवाई हुई, उसे लेकर तेहरान पहले से ही नाराज़ था.
सऊदी अरब ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि उसने अपनी जमीन और हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल ईरान पर हमले के लिए नहीं होने दिया. लेकिन ईरान का आरोप है कि खाड़ी देशों ने अमेरिकी और इजराइली ऑपरेशनों को इनडायरेक्ट समर्थन दिया. तेहरान का मानना है कि अगर किसी देश की जमीन से उसके खिलाफ कार्रवाई होती है, तो वह देश भी जवाबी कार्रवाई का हिस्सा माना जाएगा.
ट्रू प्रॉमिस 4 के तहत संदेश
अरामको पर हमला ईरान के तथाकथित “ट्रू प्रॉमिस 4” अभियान का हिस्सा बताया जा रहा है. विशेषज्ञों के अनुसार यह सिर्फ सैन्य हमला नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संकेत है. ईरान का मकसद खाड़ी देशों को यह समझाना है कि यदि वे अमेरिका और इजराइल के साथ खड़े रहेंगे, तो उन्हें भी इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है.
कतर यूनिवर्सिटी (Qatar University) की शोधकर्ता सिनेम चेंगिज़ (Sinem Cengiz) का कहना है कि पहली बार खाड़ी सहयोग परिषद यानी जीसीसी (GCC) के लगभग सभी देशों को एक ही समय में निशाना बनाया गया. बहरीन, कुवैत, कतर, यूएई और सऊदी अरब, इन सभी देशों में अमेरिकी सैन्य अड्डे मौजूद हैं. ऐसे में ईरान का संदेश साफ है कि जो भी देश अमेरिकी सैन्य मौजूदगी की मेजबानी करेगा, वह संभावित लक्ष्य बन सकता है.
तेल बाजार और भारत पर असर
रास तनूरा की रिफाइनिंग क्षमता लगभग 5.5 लाख बैरल प्रतिदिन है और इसे दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यात केंद्रों में गिना जाता है. यदि यह केंद्र लंबे समय तक बाधित रहता है, तो वैश्विक सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ सकता है. पहले ही ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) की कीमत 90 डॉलर प्रति बैरल के पार जाने की ओर बढ़ रही है.
भारत के लिए यह स्थिति खास तौर पर संवेदनशील है. भारत अपने कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से आयात करता है और रास तनूरा उस सप्लाई चेन का अहम हिस्सा है. अगर यहां उत्पादन या निर्यात प्रभावित होता है, तो पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की कीमतों में एक साथ उछाल आ सकता है. इससे महंगाई पर सीधा असर पड़ेगा.
मध्य-पूर्व मामलों के विश्लेषक क्रिस्टियन अलेक्जेंडर (Kristian Alexander) का मानना है कि यदि ईरान इस तरह के हमले जारी रखता है, तो यूएई और सऊदी अरब जैसे देश भी खुलकर जवाबी कार्रवाई में शामिल हो सकते हैं. ऐसी स्थिति में क्षेत्रीय संघर्ष व्यापक युद्ध में बदल सकता है.
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