2002 का वह वाजपेयी का वो भाषण
आज जिस ‘फ्री ट्रेड’ और साझेदारी की बात हो रही है, उसका विजन वाजपेयी ने 2002 में ही दुनिया को बता दिया था. भारत-यूरोपीय संघ के बिजनेस समिट में बोलते हुए उन्होंने एक बहुत गहरी बात कही थी. उन्होंने कहा था, हमारे हालात और हमारे संस्कार यानी कोर वैल्यू काफी मिलते-जुलते हैं. हम दोनों ही इस दुनिया के बड़े खिलाड़ी हैं. हम दोनों जगह अलग-अलग भाषाएं हैं, अलग-अलग कल्चर हैं, लेकिन फिर भी हम लोकतंत्र को सबसे ऊपर रखते हैं. वाजपेयी का कहना था कि भारत और यूरोप ‘नेचुरल पार्टनर’ हैं. उस समय उन्होंने एक टीस भी जाहिर की थी. उन्होंने कहा था- भारत और यूरोप के सबसे समझदार लोगों ने इस सपने को देखा तो है, लेकिन यह सपना अब तक हकीकत नहीं बन पाया है.
कल सच होने जा रहा है वाजपेयी का सपना
क्यों यह बुनियाद इतनी जरूरी थी?
अगर वाजपेयी ने साल 2000 में यूरोप के साथ नियमित बातचीत का सिलसिला शुरू न किया होता, तो आज इतना बड़ा भरोसा पैदा नहीं हो पाता. किसी भी ट्रेड डील के लिए दो देशों के बीच विश्वास होना सबसे जरूरी है. वाजपेयी ने दुनिया को समझाया कि भारत सिर्फ एक बाजार नहीं है, बल्कि एक जिम्मेदार लोकतांत्रिक ताकत है. कल जब इस एग्रीमेंट पर साइन होंगे, तो यह सिर्फ एक कागजी समझौता नहीं होगा. यह उस विजन की जीत होगी जो अटल बिहारी वाजपेयी ने ढाई दशक पहले देखा था कि भारत और यूरोप मिलकर दुनिया की दिशा बदल सकते हैं.
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