इन कॉरिडोरों से यात्रा कम में भारी कमी आएगी, जो वर्तमान रेल यात्रा को भारी बदलाव करेगा. मुंबई से पुणे मात्र 48 मिनट में, दिल्ली से वाराणसी लगभग 3 घंटे 50 मिनट में, तथा चेन्नई से बेंगलुरु करीब 1 घंटा 13 मिनट में तय की जा सकेगी. कुल मिलाकर ये कॉरिडोर करीब 4,000 किलोमीटर लंबे होंगे, जिनमें लगभग 16 लाख करोड़ रुपये का निवेश होगा. यह निवेश न केवल बुनियादी ढांचे को मजबूत करेगा, बल्कि जापान और अन्य देशों से उधार ली गई अत्याधुनिक तकनीक पर आधारित होगा.
रेलवे बोर्ड ने नेशनल हाई स्पीड रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एनएचएसआरसीएल) को इनके निर्माण की जिम्मेदारी सौंपी है. बोर्ड के अनुसार, पूर्व-तैयार विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) को वर्तमान कीमतों, मुद्रास्फीति और अन्य खर्चों के अनुरूप तत्काल अपडेट किया जाए. साथ ही, सम्पूर्ण देश में हाई-स्पीड रेल के लिए एकसमान तकनीकी मानक, सुरक्षा प्रोटोकॉल और ऑपरेशल नियम निर्धारित होंगे. अलग अलग टीम गठित होगी, जो मंत्रालय तय करेगी. भूमि अधिग्रहण और पूर्व-तैयारी काम तेजी से शुरू होंगे.
अनुबंध दस्तावेज शीघ्र तैयार होंगे, ताकि निर्माण कार्य निर्धारित समयसीमा में शुरू हो सके. बोर्ड ने यह भी निर्देश दिया है कि प्रत्येक कॉरिडोर के लिए आवश्यक इंजीनियरों, विशेषज्ञों और तकनीकी कर्मियों की योजना बने, जिसमें भारतीय रेलवे के अनुभवी कर्मचारियों को भी शामिल किया जाए. इनकी भर्ती, प्रशिक्षण और प्रगति पर निगरानी रखी जाएगी. ये प्रयास देश में तेज, सुरक्षित और आधुनिक रेल नेटवर्क स्थापित करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होंगे. इससे व्यापार-व्यवसाय को गति मिलेगी, पर्यटन क्षेत्र को प्रोत्साहन प्राप्त होगा तथा आर्थिक विकास नई उड़ान भरेगा. विशेष रूप से, उत्तर-पूर्वी क्षेत्र जैसे सिलीगुड़ी तक पहुंच से विकास होगा.
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