कहानी की शुरुआत 1914 में हुई, जब ईरान से आए बमन मेरवान नजराबादी (Boman Merwan Nazarabadi) ने ग्रांट रोड स्टेशन के सामने ये छोटी-सी बेकरी खोली. उस दौर में मुम्बई (तब बॉम्बे) में ट्राम चलती थीं, भीड़ और शोर कम था, ऊंची इमारतें नहीं थीं. बमन मेरवान का मकसद था कम दाम में अच्छा, पेट भरने वाला खाना और थोड़ा सुकून देना. उन्होंने ईरानी कैफे की परंपरा को यहां लाकर जिंदा रखा. शुरुआत में ये सिर्फ एक छोटी बेकरी थी, जहां लकड़ी की भट्टियों में घंटों मेहनत करके पाव, बिस्कुट और ब्रेड बनाए जाते थे. परिवार सुबह 4 बजे उठता, काम करता, और ये धंधा धीरे-धीरे एक विरासत बन गया. बच्चे यहीं पले-बढ़े, यहीं चाय बनाना, ग्राहकों से बात करना सीखा.
सबकुछ बदला, लेकिन मेरवान नहीं
दुनिया बदली. पहला विश्व युद्ध हुआ, आजादी की लड़ाई चली, बॉम्बे मुंबई बन गया, लोकल ट्रेनें आ गईं, लेकिन मेरवान में जैसे वक्त रुक गया था. पुराना काउंटर, लकड़ी की अलमारियां, सब दशकों तक वैसा ही रहा. यहां की असली शोहरत बनी मावा केक से. खोया (मावा) को केक के बैटर में मिलाकर बनाया गया ये केक इतना लाजवाब था कि उसकी खुशबू पूरे ग्रांट रोड इलाके में फैल जाती. लोग कहते थे कि सुबह 7 बजे के बाद पहुंचे तो मावा केक मिलना मुश्किल है. काउंटर पर लाइन लगतीं, सफेद टोपी वाले बुजुर्ग, कॉलेज के लड़के-लड़कियां, दफ्तर जाने वाले, सब अपनी बारी का इंतजार करते. ये केक सिर्फ मिठाई नहीं, मेरवान की पहचान बन चुका था. साथ ही प्लम केक, मस्का खारी, कुकीज भी कमाल के थे.
ऐसा था मेन्यू
यहां का मेन्यू बेहद सादा था. दीवार पर छोटा-सा बोर्ड था, जिस पर बन मस्का, ब्रुन मस्का, चाय, मावा केक, पुडिंग लिखा गया था. बन मस्का, नरम पाव में मोटी-मोटी मक्खन की परत, गर्म चाय में डुबोकर खाना मुम्बई का सबसे प्यारा नाश्ता था. ब्रुन मस्का थोड़ा क्रिस्पी, हार्ड बेक्ड वाला वैरिएंट. ईरानी चाय, गाढ़ी, मीठी, इलायची-दूध वाली, जो दिन की शुरुआत को खास बना देती. वेटर सालों से वही थे. बस हाथ के इशारे से ऑर्डर लेते और चंद मिनटों में ऑर्डर मेज पर. सबसे कम दाम, क्वालिटी से कभी कोई समझौता नहीं.

कई मुश्किलों ने एक-साथ घेरा
लेकिन वक्त ने करवट ली. नए कैफे, कॉफी शॉप्स, फास्ट फूड चेन आए. पुरानी इमारत का रखरखाव महंगा हो गया. रियल एस्टेट की कीमतें आसमान छूने लगीं. पर्यावरण नियमों से लकड़ी की भट्टियां चलाना मुश्किल हो गया. स्टाफ मिलना कम हो गया, नई पीढ़ी बाहर पढ़ाई या दूसरे कामों में चली गई. विरासत संभालने वाले हाथ घटते गए. 2014 में एक बार ‘रिपेयर’ के नाम पर कैफे बंद हुआ था, लेकिन जल्दी खुल गया. इस बार ऐसा नहीं हुआ. कई बार अफवाहें आईं, सोशल मीडिया पर Save B Merwan जैसे कैंपेन चले, लेकिन इस कहानी का अंतिम पन्ना आ चुका था.
1 जनवरी को बिनी आखिरी चाय
1 जनवरी 2026 को शटर पर एक हाथ से लिखा नोटिस लगा “We are closed. We thank you for your patronage.” उस दिन आखिरी चाय बनी, आखिरी मावा केक बिका. वेटरों की आंखें नम थीं, दीवारें खामोश थीं. 40-50 साल से काम करने वाले स्टाफ, अनगिनत यादें, सब खत्म हो गया. ग्राहकों ने सोशल मीडिया पर पुरानी तस्वीरें, रील्स शेयर किए, बचपन की यादें बताईं. कईयों को लगा जैसे कोई पुराना दोस्त चुपके से चला गया.
आज ग्रांट रोड स्टेशन से निकलो, तो वो पुरानी खुशबू गायब है. शायद इसकी जगह पर कोई नया शोरूम, ऑफिस या मॉडर्न कैफे खुले, लेकिन वो लकड़ी की कुर्सियों वाला सुकून, वो सादगी कभी नहीं लौटेगी. बी. मेरवान का बंद होना सिर्फ एक दुकान का अंत नहीं, ये मुम्बई के ईरानी कैफे कल्चर के एक युग का अंत है. मेरवान भले चला गया, लेकिन मुम्बई के दिल में हमेशा जिंदा रहेगा. एक ऐसी जगह के रूप में, जिसने एक सदी से ज्यादा समय तक लाखों लोगों को जोड़े रखा, उनकी सुबह को मीठा बनाया और जिंदगी में थोड़ा ठहराव दिया.
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