20वीं सदी में तेल के कुओं ने वैश्विक राजनीति की दिशा तय की थी. लेकिन आज, एडवांस्ड इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिक वाहन (EV), रक्षा प्रणालियां, और सेमीकंडक्टर उद्योग पूरी तरह से रेयर अर्थ खनिजों के मोहताज हैं. इन 17 तत्वों (जैसे नियोडिमियम, डिस्प्रोसियम, और लैंथेनम) के बिना न तो पवन चक्कियां घूम सकती हैं और न ही अत्याधुनिक मिसाइलें अपने लक्ष्य को भेद सकती हैं. इसलिए रेयर अर्थ की सप्लाई सुनिश्चित करना अब भारत के लिए काफी अहम हो गया है. दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं इसी के अनुसार कदम उठा रही हैं. यूरोपीय संघ ने चीन पर निर्भरता घटाने के लिए €3 अरब की प्रतिबद्धता जताई है, जबकि अमेरिका नए खनिज गठबंधन और औद्योगिक इकोसिस्टम खड़े कर रहा है. इसके मुकाबले भारत अब भी असुरक्षित स्थिति में है.
चीन का दबदबा
ईटी नाऊ की एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में इस क्षेत्र में चीन का दबदबा निर्विवाद और डराने वाला है. बीजिंग न केवल वैश्विक खनन का 70% नियंत्रित करता है, बल्कि वह रिफाइनिंग और प्रोसेसिंग की 90% क्षमता पर कुंडली मार कर बैठा है. पिछले साल जब चीन ने सात प्रमुख तत्वों के निर्यात पर प्रतिबंध लगाया, तो वैश्विक ऑटोमोबाइल और रक्षा क्षेत्र में हड़कंप मच गया. भारत के लिए यह एक ‘वेक-अप कॉल’ था.
भारत ने शुरू कर दी हैं कोशिशें
भारत ने पहले ही नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन (NCMM) के जरिए रेयल अर्थ में आयात पर निर्भरता कम रेन का आधार तैयार कर लिया है. हालांकि, उद्योग जगत के नेताओं और नीति विशेषज्ञों का कहना है कि बजट 2026 को इससे आगे बढ़ते हुए निजी निवेश के जोखिम कम करने होंगे. उद्योग जगत को बजट 2026 से केवल सब्सिडी की उम्मीद नहीं है, बल्कि एक ऐसे ‘इकोसिस्टम’ की दरकार है जहां निजी क्षेत्र निवेश करने का साहस कर सके. इसके लिए दीर्घकालिक वित्तपोषण, लक्षित टैक्स इंसेंटिव, सुनिश्चित ऑफटेक एग्रीमेंट और वैल्यू-चेन से जुड़े प्रोत्साहन जरूरी हैं. इनके बिना भारत केवल नीति के स्तर पर ही अटका रह सकता है, जबकि वैश्विक प्रतिस्पर्धी तेज़ी से आगे निकलते जा रहे हैं.
सरकार से अपेक्षा
चीन की ताकत उसकी सस्ती लेबर नहीं, बल्कि उसकी दशकों पुरानी ‘प्रोसेस इंजीनियरिंग’ और राज्य-समर्थित मूल्य नियंत्रण है. भारत को ऑस्ट्रेलिया और जापान के मॉडल से सीखना होगा, जहां सरकारें निजी कंपनियों के साथ मिलकर रणनीतिक स्टॉकपाइल (भंडारण) बनाती हैं. बाजार जानकारों का कहना है कि सरकार को चार काम करने होगे-
- वित्तीय प्रोत्साहन और PLI का विस्तार: वर्तमान में ₹7,280 करोड़ की मैग्नेट पीएलआई योजना सराहनीय है, लेकिन इसे ‘अपस्ट्रीम’ गतिविधियों (ऑक्साइड्स और मेटल्स का निर्माण) तक विस्तारित करना होगा. जब तक कच्ची धातु भारत में तैयार नहीं होगी, तब तक मैग्नेट निर्माण की लागत प्रतिस्पर्धी नहीं हो पाएगी.
- टैक्स हॉलिडे और दीर्घकालिक वित्तपोषण: रेयर अर्थ प्रोजेक्ट्स की ‘जेस्टेशन अवधि’ (परियोजना शुरू होने से लाभ मिलने तक का समय) लंबी होती है. बजट में इन परियोजनाओं के लिए 10-15 साल के टैक्स हॉलिडे और कम ब्याज दरों वाले ऋण की घोषणा होनी चाहिए.
- सेमीकंडक्टर की तर्ज पर ‘प्लग-एंड-प्ले’ हब: सरकार को तटीय क्षेत्रों में ऐसे इंफ्रास्ट्रक्चर हब बनाने चाहिए जहाँ साझा प्रोसेसिंग प्लांट हों. इससे छोटे और मध्यम स्तर के डेवलपर्स की लागत कम होगी.
- नियामक सुधार: मोनाजाइट को परमाणु ऊर्जा की सख्त बेड़ियों से मुक्त कर व्यावसायिक खनन के लिए अधिक पारदर्शी बनाना और कोस्टल रेगुलेशन ज़ोन (CRZ) नियमों में सामरिक छूट देना समय की मांग है.
वेदांता रिसोर्सेज की सीईओ देशनी नायडू का कहना है कि NCMM के जरिए सरकार का क्रिटिकल मिनरल्स पर फोकस जरूरी प्रोत्साहन दे रहा है. भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण और ऊर्जा परिवर्तन के लिए धातुओं और खनिजों को सुरक्षित करना अनिवार्य है.
भंडार प्रचुर, उत्पादन बेहद कम
भारत के पास वैश्विक रेयर अर्थ भंडार का अनुमानित 6–8% (करीब 69 लाख टन) है, लेकिन वैश्विक उत्पादन में उसकी हिस्सेदारी 1% से भी कम है. मूल्य-वर्धित उत्पादों के निर्यात के बजाय भारत अधिकतर कंसन्ट्रेट्स निर्यात करता है और मैग्नेट व मोटर जैसे तैयार कंपोनेंट्स आयात करता है. PwC इंडिया में एसोसिएट डायरेक्टर अभिनव सेनगुप्ता का कहना है कि भारत के पास भंडार हैं, लेकिन इकोसिस्टम नहीं. खनन केवल पहला कदम है. असल चुनौती प्रोसेसिंग, रिफाइनिंग और सेपरेशन में है. भारत में मैग्नेट निर्माण जैसी अहम मिडस्ट्रीम क्षमताओं की भी कमी है. बीच सैंड खनन में रेडियोधर्मी थोरियम और कोस्टल रेगुलेशन ज़ोन (CRZ) नियमों के कारण देरी होती है, वहीं रेयर अर्थ केमिस्ट्री और प्रोसेस इंजीनियरिंग में कौशल की कमी समस्या को और गंभीर बनाती है.
भारत का प्रमुख रेयर अर्थ स्रोत मोनाजाइट केरल, तमिलनाडु, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात के तटीय बीच सैंड्स में व्यापक रूप से फैला है. साथ ही झारखंड और पश्चिम बंगाल में अंतर्देशीय भंडार भी हैं. लेकिन परमाणु ऊर्जा अधिनियम के तहत लंबे समय तक निजी भागीदारी पर प्रतिबंध रहा, जिसमें 2023 से ही सीमित निजीकरण शुरू हुआ. लंबे प्रोजेक्ट टाइमलाइन, भारी पूंजी निवेश, डिपॉजिट-विशेष प्रोसेसिंग टेक्नोलॉजी की कमी और अनिश्चित रिटर्न निवेशकों को हतोत्साहित करते रहे हैं.
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