2025 वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए उलझनों से भरा साल रहा. एक तरफ सोने की चमक और तेज हुई, दूसरी ओर सेंट्रल बैंकों की खरीदारी में बड़ी गिरावट दर्ज हुई. भारत इसका साफ उदाहरण है. भारतीय रिजर्व बैंक ने 2024 में करीब 72.6 टन सोना खरीदा था, लेकिन 2025 में यह आंकड़ा घटकर केवल 4.02 टन रह गया. लगभग 94 प्रतिशत की कमी. यह बदलाव केवल भारत तक सीमित नहीं रहा. वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के आंकड़ों के अनुसार 2024 में दुनियाभर के सेंट्रल बैंकों ने लगभग 1089 टन सोना खरीदा था, जबकि 2025 में नवंबर तक यह करीब 297 टन पर आकर रुक गया. दिसंबर के अनुमान जोड़ें तो पूरे साल की खरीद लगभग 320 से 350 टन रहने की संभावना जताई गई, जो पिछले साल से करीब 70 प्रतिशत कम है.
सेंट्रल बैंकों ने कहा कुछ, किया कुछ
सेंट्रल बैंक आम तौर पर सोने को अपनी रिज़र्व संपत्ति में इसलिए रखते हैं, क्योंकि यह सुरक्षित माना जाता है, आसानी से कैश में बदला जा सकता है और लंबे समय में मूल्य बनाए रखता है. महंगाई से बचाव, निवेश में विविधता और भू-राजनीतिक जोखिमों से सुरक्षा इसके बड़े कारण हैं. सोने का सीधा रिलेशन डॉलर या बॉन्ड जैसी संपत्तियों से कम होता है, इसलिए संकट के समय यह संतुलन बनाए रखता है. दिलचस्प बात यह है कि 2025 के सर्वे में वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल से जुड़े लगभग 95 प्रतिशत सेंट्रल बैंकों ने कहा था कि वे अपने गोल्ड रिज़र्व बढ़ाना चाहते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट निकली.
पिछले कुछ वर्षों में सेंट्रल बैंकों की खरीद ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गई थी. 2022, 2023 और 2024 में हर साल 1000 टन से ज्यादा सोना खरीदा गया. इसके पीछे 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद बढ़ा अविश्वास, रूस-यूक्रेन युद्ध, अमेरिका-चीन व्यापार तनाव और डॉलर पर बढ़ती निर्भरता को कम करने की कोशिशें थीं. चीन, तुर्की और भारत जैसे उभरते देशों ने डॉलर की जगह सोने को मजबूत विकल्प के तौर पर अपनाया. मगर 2025 में तस्वीर बदल गई, क्योंकि सोने की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गईं और खरीद महंगी हो गई.
अगर देशों की खरीद की तुलना करें तो 2024 में चीन, तुर्की, भारत, पोलैंड और कजाकिस्तान सबसे बड़े खरीदार रहे थे. 2025 में स्थिति बदली. पोलैंड ने लगभग 95 टन सोना खरीदा, कजाकिस्तान ने 49 टन, अजरबैजान ने 34.5 टन, ब्राजील ने 31.5 टन और चीन ने करीब 24.9 टन. साल के पहले छह महीनों में कुल खरीद करीब 415 टन रही, जो पिछले साल की तुलना में लगभग 21 प्रतिशत कम थी. तीसरी तिमाही में भी रफ्तार धीमी रही.
कुछ देशों ने अपनी खरीदारी में तेजी से कटौती की. भारत और चीन ने बड़ी मात्रा में खरीद घटाई, वहीं तुर्की की गति भी पहले जैसी नहीं रही. उज्बेकिस्तान जैसे कुछ देशों ने तो सोना बेच भी दिया. इसकी मुख्य वजह ऊंची कीमतें और घरेलू आर्थिक दबाव रहे. इसके उलट पोलैंड और कजाकिस्तान जैसे देशों ने यूरोप में जारी अनिश्चितता के कारण अपनी खरीद बढ़ाई, ताकि भविष्य के जोखिमों से खुद को सुरक्षित रख सकें.
डेढ़ साल में 60 फीसदी बढ़ी कीमत
बीते डेढ़ साल में सोने के भाव में करीब 60 प्रतिशत से ज्यादा की तेजी आई. 2024 के अंत में जहां कीमतें लगभग 2790 डॉलर प्रति औंस थीं, वहीं 2025 में यह बढ़कर करीब 4381 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच गईं. इसके पीछे मध्य पूर्व और ताइवान से जुड़ी तनातनी, टैरिफ को लेकर डोनाल्ड ट्रंप की बयानबाजी, डॉलर की कमजोरी और फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों में कटौती जैसे कारण रहे. महंगाई और मंदी की आशंका से निजी निवेशकों और ईटीएफ फंड्स की मांग भी तेजी से बढ़ी, जिससे कीमतों को और सहारा मिला.
भविष्य में क्या चाल चलेगा सोना?
भविष्य को लेकर बड़े वैश्विक बैंक अभी भी सोने को लेकर आशावादी हैं. गोल्डमैन सैक्स ने अनुमान दिया है कि 2026 के अंत तक सोने की कीमत लगभग 5400 डॉलर प्रति औंस तक जा सकती है. जेपी मॉर्गन का मानना है कि कीमत करीब 5055 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच सकती है. बैंक ऑफ अमेरिका ने 5000 डॉलर, यूबीएस ने 5400 डॉलर और मॉर्गन स्टेनली ने 4500 डॉलर प्रति औंस का अनुमान जताया है.
इन संस्थानों का तर्क है कि भू-राजनीतिक तनाव, डॉलर की कमजोरी और ब्याज दरों में कटौती सोने को नई ऊंचाइयों तक ले जा सकती है. वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल का भी मानना है कि अगर वैश्विक मंदी आती है तो कीमतें 5000 डॉलर के पार जा सकती हैं, हालांकि मजबूत आर्थिक वृद्धि की स्थिति में दाम 4000 डॉलर से 4500 डॉलर के दायरे में स्थिर रह सकते हैं.
भारत में 2 लाख के पार जाने की संभावना
यदि ग्लोबली सोने की कीमत $5,400 प्रति औंस हो जाती है, तो भारत में (दिल्ली में) 24 कैरेट गोल्ड की कीमत प्रति 10 ग्राम लगभग 1,95,000 से 2,05,000 रुपये के बीच पहुंच सकती है. यह अनुमान वर्तमान एक्सचेंज रेट (91.5 INR प्रति USD), इम्पोर्ट ड्यूटी (6% कुल, 2024-25 में कटौती के बाद), GST (3%) और लोकल प्रीमियम (5-10%) को ध्यान में रखकर है. वर्तमान में (23 जनवरी 2026) दिल्ली में यह कीमत 1,54,000 से 1,59,000 रुपये प्रति 10 ग्राम है, यानी $5,400 पर 25-30% की बढ़ोतरी संभव है.
एक्सचेंज रेट या ड्यूटी में बदलाव से थोड़ा ऊपर-नीचे हो सकता है, लेकिन औसतन ₹2 लाख के आसपास रहने की उम्मीद है.
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