बीजिंग/नई दिल्ली. वैश्विक तेल के खेल में बाजी पलट गई है. जैसे ही भारत ने पश्चिमी प्रतिबंधों की सख्ती को देखते हुए रूसी तेल से थोड़ा किनारा किया, चीन ने तुरंत मौके का फायदा उठा लिया. खबर है कि चीन ने रूस के लिए अपनी तिजोरी का मुंह खोल दिया है और उन सारे तेल के टैंकरों को अपनी तरफ मोड़ लिया है, जो पहले भारत या तुर्की जाने वाले थे. भारत ने हाथ खींचे, चीन ने मौका लपका ताजा आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि प्रतिबंधों का डर भारत को सता रहा है, लेकिन चीन बेखौफ होकर खरीदारी कर रहा है.
LSEG के डेटा के मुताबिक, जनवरी में चीन समुद्र के रास्ते रूस से हर दिन करीब 15 लाख बैरल तेल खरीदने जा रहा है. यह आंकड़ा पिछले महीने (दिसंबर) के मुकाबले काफी ज्यादा है, जब यह 11 लाख बैरल था. जो रूसी ‘यूराल क्रूड’ (Urals Crude) कल तक भारतीय रिफाइनरियों की पहली पसंद था, अब वो चीन जा रहा है. जनवरी में चीन ने इस तेल की खरीद बढ़ाकर 4 लाख 5 हजार बैरल प्रतिदिन कर दी है, जो पिछले डेढ़ साल का रिकॉर्ड है.
आखिर भारत ने क्यों दी ढील?
भारत की ‘ढील’ के पीछे की वजह अमेरिका और यूरोप का डंडा है. 2025 के आखिर में पश्चिमी देशों ने रूसी तेल कंपनियों (जैसे रोसनेफ्ट और लुकोइल) पर शिकंजा कस दिया था. पेमेंट में दिक्कतें और जहाजों पर कड़ी निगरानी के चलते भारतीय रिफाइनर्स ने अपने हाथ थोड़े खींच लिए हैं. दिसंबर में भारत का रूसी तेल आयात गिरकर 10 लाख बैरल प्रतिदिन से भी नीचे आ गया, जो पिछले साल 13 लाख बैरल के औसत पर था. भारत अब जोखिम लेने के बजाय दूसरे देशों से तेल मांग रहा है.
चीन की तो ‘चांदी’ हो गई
भारत और तुर्की के पीछे हटने से रूस के पास तेल का भंडार जमा हो गया, जिसे बेचने के लिए उसने भारी डिस्काउंट ऑफर कर दिया. चीन को अब यह तेल ग्लोबल मार्केट रेट से 10 से 12 डॉलर सस्ता मिल रहा है. बाजार के जानकारों का कहना है कि भारत और तुर्की के हटने से जो खालीपन आया, उसे भरने के लिए चीन ने अपनी तिजोरी खोल दी और सस्ते दाम पर अपनी एनर्जी सिक्योरिटी पक्की कर ली. सीधा सा गणित है कि पश्चिमी प्रतिबंधों ने भारत को तो डरा दिया, लेकिन चीन के लिए जैकपॉट खोल दिया. अब रूस का जो तेल भारत की इकोनॉमी को सहारा दे रहा था, वो अब चीन की रफ्तार बढ़ा रहा है.