हमारे पड़ोसी पाकिस्तान में डीजल के दाम 55 रुपये प्रति लीटर बढ़ चुके हैं. बांग्लादेश में किसानों को प्रति दिन केवल दो लीटर ही डीजल दिया जा रहा है. यूरोपीय देश रोमानिया में कृषि डीजल की कीमतें 25% तक उछल गई हैं. आस्ट्रेलिया में किसानों को उनकी जरूरत से कम डीजल मिल रहा है. जर्मनी में तो किसानों को अब डीजल 32 रुपये प्रति लीटर महंगा मिल रहा है. फिलीपींस में भी डीजल महंगा हो गया है. इंग्लैंड में भी डीजल के लिए किसानों को परेशानी झेलने की आशंका जताई जाने लगी है. लेकिन, अच्छी बात यह है कि भारत में अभी तक न तो डीजल के दाम बढ़ा है और न ही किसी तरह की कोई कमी है. यहां किसानों का उनकी जरूरत का तेल बिना किसी परेशानी के मिल रहा है.
बांग्लादेश : धान सूखने का डर
ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेश के उत्तरी रंगपुर क्षेत्र में धान की सबसे महत्वपूर्ण ‘बोरो’ फसल की सिंचाई डीजल इंजन वाले पंपों से होती है. सरकार ने संकट को भांपते हुए डीजल की राशनिंग शुरू कर दी है. अब प्रति व्यक्ति रोजाना केवल 2 लीटर डीजल दिया जा रहा है. किसान हरप्रसाद राय का कहना है कि उनकी दो एकड़ जमीन को रोजाना कम से कम 3 लीटर डीजल की जरूरत होती है, लेकिन पंपों पर घंटों लाइन लगाने के बाद उन्हें बमुश्किल 1 लीटर तेल मिलता है. यदि सिंचाई नहीं हुई तो उत्पादन गिरना तय है.
फिलीपींस: किनारे लगने लगी नावें
फिलीपींस में डीजल की कीमत बढ़ने से चावल उत्पादक किसान परेशान हैं. किसान जेसफर विलेगास बताते हैं कि वे कटाई के लिए हार्वेस्टर मशीन किराए पर लेते हैं और बदले में अपनी फसल का 10% हिस्सा देते हैं. लेकिन डीजल महंगा होने के कारण अब मशीन मालिक फसल का ज्यादा हिस्सा मांग रहे हैं. इससे उनके पास बाजार में बेचने के लिए कम अनाज बचेगा.
वहीं, डीजल की बढ़ती कीमतों के कारण फिलीपींस के मछुआरों को रोजाना करीब 500 पेसो का नुकसान हो रहा है. इस वजह से बहुत से मछुआरे अब मछली पकड़ने समुद्र में नहीं जा रहे हैं और अपनी नावें किनारे पर खड़ी कर दी है.
ऑस्ट्रेलिया: नहीं मिल रहा पूरा डीजल
संकट केवल विकासशील देशों तक सीमित नहीं है. ऑस्ट्रेलिया, जो दुनिया का एक प्रमुख अनाज निर्यातक है, वहां भी ‘ईंधन राशनिंग’ शुरू हो गई है. पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में गेहूं और जौ की बुवाई शुरू होने में एक महीना बचा है, लेकिन आपूर्तिकर्ताओं ने किसानों को उनके ऑर्डर से कम डीजल देना शुरू कर दिया है. ग्रेन ग्रोअर्स लिमिटेड के चेयरमैन रीस टर्टन का कहना है कि अगर अगले चार हफ्तों में आपूर्ति सामान्य नहीं हुई, तो बुवाई का पूरा सीजन बर्बाद हो सकता है.
जर्मनी में बढ़ा रेट
जर्मनी में किसानों को हर 100 लीटर ईंधन पर 30 यूरो अतिरिक्त देने पड़ रहे हैं. यानी करीब 32 रुपये लीटर ज्यादा. यहां बड़े ट्रैक्टर हर दिन करीब 250 लीटर ईंधन खपत करते हैं. ब्रिटेन के किसान रिचर्ड हेडी चेतावनी देते हैं कि वसंत के बीच तक उनका डीजल स्टॉक खत्म हो जाएगा. वे कहते हैं, “अगर हमारे पास फसलों को कीटों से बचाने और पोषक तत्व देने के लिए ईंधन नहीं होगा, तो बहुत नुकान होगा.” रोमानिया में भी युद्ध शुरू होने के बाद कृषि डीजल की कीमत लगभग 25% बढ़ चुकी है जिससे किसानों का खर्चा बढ़ चुका है.
थाली पर कैसे होगा असर?
जब भी ऊर्जा आपूर्ति बाधित होती है या ईंधन की कीमत बढ़ती है तो कृषि क्षेत्र जरूर प्रभावित होता है. यदि अमेरिका-इज़राइल और ईरान के बीच यह युद्ध लंबा चला, तो दुनिया को न केवल ऊर्जा संकट बल्कि एक भीषण खाद्य मुद्रास्फीति (Food Inflation) और खाद्य पदार्थों की कमी का सामना करना पड़ सकता है. कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट ‘अस्थायी’ नहीं है. सिडनी स्थित राबोबैंक के विश्लेषक पॉल जूल्स के अनुसार, खेती का खर्च लंबे समय तक ऊंची रहेगी. जब डीजल महंगा होता है, तो उसके तीन सीधे असर होते हैं.
जूल्स के अनुसार, उत्पादन कम होगा क्योंकि डीजल न मिलने पर किसान कम जमीन पर खेती करेंगे. महंगा ईंधन अनाज की कीमत को बढ़ा देगा. इससे सप्लाई चेन प्रभावित होगी क्योंकि फसल को खेत से मंडी और मंडी से उपभोक्ता तक पहुंचाने के लिए जिन वाहनों का इस्तेमाल होता है, वो डीजल से चलते हैं. महंगा डीजल मतलब ज्यादा किराया. इससे सामान की कीमत बढ़ जाएगी.
खेती का अपना एक निश्चित समय चक्र होता है. बुवाई या कटाई में एक हफ्ते की देरी भी पूरी फसल को बर्बाद कर सकती है. मध्य पूर्व के युद्ध ने इसी कैलेंडर को चुनौती दी है. पशुपालन उद्योग भी संकट में है क्योंकि मवेशियों के लिए चारा पहुंचाने और दूध को बाजारों तक ले जाने के लिए परिवहन की निरंतर आवश्यकता होती है. यदि परिवहन रुका तो अनाज के साथ-साथ दूध, मांस और अन्य डेयरी उत्पादों की कीमतें भी बढ़ जाएंगी.
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