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पोर्टफोलियो रीबैलेंसिंग का मतलब है निवेश को मूल एसेट एलोकेशन के अनुसार दोबारा संतुलित करना, जैसे इक्विटी और डेट के बीच सही अनुपात बनाए रखना. जब बाजार में तेजी से इक्विटी का हिस्सा ज्यादा बढ़ जाता है, तो कुछ निवेश डेट में शिफ्ट कर जोखिम कम किया जाता है. इससे पोर्टफोलियो बहुत ज्यादा केंद्रित होने से बचता है और लंबी अवधि में स्थिर रिटर्न मिल सकते हैं. विशेषज्ञों के अनुसार साल में एक बार या एसेट एलोकेशन 5–10% से ज्यादा बदलने पर रीबैलेंस करना बेहतर माना जाता है.
करना आसान लगता है, लेकिन सही तरीके से मैनेज न करने पर बड़ा नुकसान हो सकता है.कई निवेशक अच्छे रिटर्न के चक्कर में अपना पैसा एक ही शेयर, म्यूचुअल फंड या एसेट क्लास में ज्यादा लगा देते हैं. इससे पोर्टफोलियो ‘कंसंट्रेटेड’ हो जाता है, जो बाजार गिरने पर भारी नुकसान पहुंचाता है. असल में पोर्टफोलियो रीबैलेंसिंग एक जरूरी तरीका है, जो निवेश को संतुलित रखती है और जोखिम को कम करती है. लेकिन ज्यादातर लोग इसमें गलतियां कर बैठते हैं.

पोर्टफोलियो रीबैलेंसिंग का मतलब है अपने निवेश को मूल योजना के अनुसार दोबारा संतुलित करना. मान लीजिए आपने शुरू में 60% इक्विटी (शेयर/म्यूचुअल फंड) और 40% डेट (फिक्स्ड डिपॉजिट, बॉन्ड) में पैसा लगाया था. अगर बाजार अच्छा चला तो इक्विटी का हिस्सा 70-80% तक बढ़ सकता है. रीबैलेंसिंग में आप कुछ इक्विटी बेचकर डेट में डालते हैं, ताकि रिस्क-रिटर्न बैलेंस बना रहे. यह प्रोसेस जोखिम को कंट्रोल करती है और लंबे समय में बेहतर रिटर्न देती है.

कई निवेशक सोचते हैं कि अच्छा चल रहा है तो छेड़छाड़ क्यों करें? लेकिन यही सबसे बड़ी गलती है. अगर एक एसेट क्लास लगातार अच्छा प्रदर्शन करे तो लोग ज्यादा पैसा उसी में डाल देते हैं. इससे पोर्टफोलियो केंद्रित हो जाता है. कंसंट्रेटेड पोर्टफोलियो रिस्क से भरा होता है, क्योंकि एक ही सेक्टर या शेयर में गिरावट आने पर पूरी पूंजी प्रभावित होती है. बाजार की अनिश्चितता में यह ‘सब कुछ खोने’ जैसा हो सकता है.
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दूसरी आम गलती है रीबैलेंसिंग का समय न तय करना. कुछ लोग साल में एक बार भी नहीं करते, जबकि कुछ बहुत बार-बार कर डालते हैं, जिससे ट्रांजेक्शन कॉस्ट और टैक्स बढ़ जाता है. विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि साल में एक बार (जैसे फाइनेंशियल ईयर की शुरुआत में) या जब एसेट एलोकेशन 5-10% से ज्यादा बिगड़ जाए, तब रीबैलेंस करें. बिना प्लान के करना या भावनाओं में आकर (जैसे बाजार गिरने पर बेचना) गलत साबित होता है.

तीसरी गलती है डायवर्सिफिकेशन की कमी. निवेशक एक ही फंड हाउस, एक ही सेक्टर या सिर्फ इक्विटी में पैसा लगाते हैं. कंसंट्रेटेड पोर्टफोलियो बाजार गिरने पर भारी नुकसान देता है. सुधार के लिए अलग-अलग एसेट क्लास (इक्विटी, डेट, गोल्ड), अलग-अलग मार्केट कैप (लार्ज, मिड, स्मॉल) और सेक्टर में फैलाएं. इससे रिस्क फैलता है.

चौथी गलती है रिव्यू न करना. निवेश शुरू करने के बाद कई लोग पोर्टफोलियो को भूल जाते हैं. लेकिन समय-समय पर रिव्यू जरूरी है. अगर फंड का प्रदर्शन खराब हो रहा है, फंड मैनेजर बदल गया है या आपकी रिस्क क्षमता बदली है, तो बदलाव करें. रीबैलेंसिंग में पुराने फंड बेचकर नए बेहतर फंड में शिफ्ट करें.

रीबैलेंसिंग कैसे करें? सबसे पहले अपनी रिस्क प्रोफाइल और गोल तय करें. फिर एसेट एलोकेशन प्लान बनाएं (जैसे 50-30-20: इक्विटी-डेट-गोल्ड). हर 6-12 महीने में चेक करें. अगर बिगड़ा है तो बेच-खरीद करें. टैक्स बचाने के लिए लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन का फायदा लें. SIP में ऑटोमैटिक रीबैलेंसिंग वाले फंड चुन सकते हैं.

निवेश सफलता की कुंजी अनुशासन और संतुलन है . सेंट्रेलाइज्ड पोर्टफोलियो से बचें, नियमित रीबैलेंसिंग करें और भावनाओं से दूर रहें. सही तरीके से रीबैलेंसिंग करने से जोखिम कम होता है, रिटर्न स्थिर रहता है और लंबे समय में पैसा बढ़ता है.
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