भारत के फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व में गिरावट आई है. 6 फरवरी को खत्म हुए सप्ताह में भारत का फॉरेक्स रिजर्व 6.71 अरब डॉलर टूटकर 717.064 अरब डॉलर पर पहुंच गया. हालांकि, इस गिरावट में बड़ा योगदान गोल्ड का रहा क्योंकि करेंसीज के रिजर्व में तो उछाल दर्ज किया गय. भारत के पास अब 123 अरब डॉलर का गोल्ड बचा है
फॉरेक्स रिजर्व का सबसे बड़ा हिस्सा विदेशी मुद्रा परिसंपत्ति (FCA) होता है. इसमें 7.661 अरब डॉलर की तेजी देखी गई है. यह बढ़कर 570.053 डॉलर पर पहुंच गया. लेकिन गोल्ड रिजर्व 14.208 अरब डॉलर टूटकर 123.476 अरब डॉलर पर आ गया. भारत के पास जितनी विदेशी मुद्रा पड़ी है उसमें 11 महीने का सामान आयात किया जा सकता है. आरबीआई का कहना है कि भारत का एक्सटर्नल सेक्टर देश की बाहरी वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त है.
पिछले वर्षों के उतार-चढ़ाव का विश्लेषण
भारत के विदेशी मुद्रा भंडार के पिछले चार सालों के आंकड़े एक दिलचस्प कहानी बताते हैं. 2022 में वैश्विक परिस्थितियों के कारण 71 अरब डॉलर की बड़ी गिरावट देखी गई थी, जो अब तक की सबसे बड़ी गिरावटों में से एक थी. हालांकि, 2023 में 58 अरब डॉलर की वापसी के साथ स्थिति सुधरी. 2024 की धीमी बढ़त के बाद, 2025 में 56 अरब डॉलर का इजाफा यह संकेत देता है कि भारत का विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) प्रवाह स्थिर बना हुआ है.
क्या होता है फॉरेक्स रिजर्व और इसमें क्या शामिल है?
विदेशी मुद्रा भंडार किसी भी देश के केंद्रीय बैंक (भारत में आरबीआई) द्वारा रखी गई वह संपत्ति है, जिसका उपयोग जरूरत पड़ने पर अंतरराष्ट्रीय देनदारियों के भुगतान के लिए किया जाता है. इस भंडार में मुख्य रूप से अमेरिकी डॉलर को रखा जाता है, लेकिन इसके छोटे हिस्सों में यूरो, जापानी येन और ब्रिटिश पाउंड स्टर्लिंग जैसी अन्य वैश्विक मुद्राएं भी शामिल होती हैं. यह भंडार देश के आयात बिलों के भुगतान और मुद्रा की विनिमय दर को स्थिर रखने के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम करता है.
रुपये को बचाने में आरबीआई की रणनीतिक भूमिका
भारतीय रिजर्व बैंक अक्सर बाजार में हस्तक्षेप करता है ताकि रुपये की वैल्यू में अचानक बड़ी गिरावट न आए. आरबीआई की रणनीति सरल लेकिन प्रभावी है जब बाजार में रुपया मजबूत होता है, तो वह डॉलर की खरीदारी करके भंडार बढ़ाता है, और जब रुपया कमजोर होने लगता है, तो वह भंडार से डॉलर बेचकर बाजार में नकदी (Liquidity) बढ़ाता है. इस हस्तक्षेप से रुपये में होने वाले उतार-चढ़ाव को नियंत्रित किया जाता है, जिससे आयात महंगा नहीं होता और महंगाई पर लगाम रहती है.
अर्थव्यवस्था पर भंडार बढ़ने का प्रभाव
विदेशी मुद्रा भंडार का बढ़ना केवल एक नंबर नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की साख बढ़ाता है. एक मजबूत भंडार होने से विदेशी रेटिंग एजेंसियां देश को बेहतर रेटिंग देती हैं, जिससे सरकारी और निजी क्षेत्रों के लिए विदेश से कर्ज लेना सस्ता हो जाता है. इसके अलावा, कच्चा तेल और सोने जैसे जरूरी सामानों के आयात के लिए भारत के पास पर्याप्त बैकअप सुनिश्चित होता है, जो अंततः घरेलू अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करता है.
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जय ठाकुर 2018 से खबरों की दुनिया से जुड़े हुए हैं. 2022 से News18Hindi में सीनियर सब एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं और बिजनेस टीम का हिस्सा हैं. बिजनेस, विशेषकर शेयर बाजार से जुड़ी खबरों में रुचि है. इसके अलावा दे…और पढ़ें
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