असल में यह गिरावट अंतरराष्ट्रीय राजनीति से जुड़ी खबरों की वजह से आई. इससे पहले ट्रंप ने ग्रीनलैंड को लेकर सख्त रुख अपनाया था और कुछ देशों पर टैरिफ लगाने की धमकी दी थी. इस बयान से अमेरिका और यूरोप के बीच तनाव बढ़ने लगा था. ऐसे माहौल में निवेशक डर के कारण सुरक्षित माने जाने वाले निवेश, यानी सोना और चांदी की ओर भागते हैं. इसी वजह से इनके दाम तेजी से बढ़े और ईटीएफ ने भी नई ऊंचाई छू ली.
ट्रंप के बयान से बदल गए हालात
लेकिन दावोस में नाटो के महासचिव मार्क रुट्टे से मुलाकात के बाद ट्रंप ने अपना रुख बदल लिया. उन्होंने ट्रुथ सोशल पर लिखा, “इस समझ के आधार पर मैं वह टैरिफ लागू नहीं करूंगा जो एक फरवरी से लागू होने वाले थे.” हालांकि उन्होंने समझौते का पूरा ब्योरा नहीं दिया. इसके साथ ही उन्होंने यह भी साफ कहा कि अमेरिका ग्रीनलैंड पर कब्जा करने के लिए सैन्य बल का इस्तेमाल नहीं करेगा. ट्रंप ने कहा, “मैं ऐसा नहीं करूंगा. ठीक है? लोग सोच रहे थे कि मैं ताकत का इस्तेमाल करूंगा, लेकिन मुझे ताकत इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं है, मैं करना नहीं चाहता और मैं नहीं करूंगा.”
जोखिम घटा तो सोने-चांदी में हुई बिकवाली
इन बयानों से बाजार को संकेत मिला कि अंतरराष्ट्रीय तनाव कुछ कम हो सकता है. जैसे ही जोखिम घटा, निवेशकों ने सोने और चांदी से मुनाफा निकालना शुरू कर दिया. इसका सीधा असर ईटीएफ पर पड़ा. टाटा सिल्वर ईटीएफ करीब 21 प्रतिशत टूटकर लगभग 26.41 रुपये पर आ गया. ग्रो, थ्री सिक्स्टी वन और एक्सिस सिल्वर ईटीएफ में लगभग 16 प्रतिशत की गिरावट आई. कोटक, मिराए एसेट और आदित्य बिड़ला सन लाइफ सिल्वर ईटीएफ करीब 15 प्रतिशत फिसले, जबकि निप्पॉन सिल्वर ईटीएफ, डीएसपी, एचडीएफसी, आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल और बंधन सिल्वर ईटीएफ लगभग 14 प्रतिशत तक गिर गए.
गोल्ड ईटीएफ भी इस गिरावट से अछूते नहीं रहे. बिड़ला सन लाइफ गोल्ड ईटीएफ करीब 12 प्रतिशत गिरकर लगभग 130.42 रुपये पर आ गया. एक्सिस, टाटा और बंधन गोल्ड ईटीएफ में करीब 11 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई. डीएसपी, एचडीएफसी, निप्पॉन इंडिया गोल्ड ईटीएफ, एलआईसी एमएफ गोल्ड ईटीएफ और अन्य फंड भी 9 प्रतिशत से ज्यादा टूट गए, जबकि एक दिन पहले ही ये अपने नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचे थे.
भारतीय शेयर बाजार पर भी बड़ा असर
इस हलचल का असर शेयर बाजार में भी दिखा. हिंदुस्तान जिंक के शेयर 6 प्रतिशत से ज्यादा गिरकर लगभग 653.10 रुपये पर आ गए. यह कंपनी भारत में चांदी की सबसे बड़ी उत्पादक मानी जाती है और कम से कम 99.9 प्रतिशत शुद्धता वाली रिफाइंड सिल्वर तैयार करती है. जब चांदी की कीमत गिरती है तो ऐसी कंपनियों के शेयर भी दबाव में आ जाते हैं.
सोना-चांदी में अब आगे क्या?
आगे का रास्ता क्या हो सकता है, इस पर विशेषज्ञों की राय थोड़ी संतुलित है. रॉयटर्स के मुताबिक, एएनजेड की कमोडिटी स्ट्रैटेजिस्ट सोनी कुमारी ने कहा, “अमेरिकी राष्ट्रपति की टिप्पणियों में बदलाव से भू-राजनीतिक तनाव कम हुआ और इसी वजह से कीमतों में गिरावट देखी गई.” उन्होंने यह भी जोड़ा, “हम अभी भी सोने को प्राथमिकता देते हैं क्योंकि इसे केंद्रीय बैंकों का समर्थन मिला हुआ है और यह अन्य औद्योगिक धातुओं की तुलना में मजबूत स्थिति में बना हुआ है, क्योंकि वैश्विक तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं.”
वहीं गोल्डमैन सैक्स ने सोने को लेकर लंबी अवधि का नजरिया और भी मजबूत बताया है. ब्रोकरेज ने दिसंबर 2026 के लिए सोने का अनुमान बढ़ाकर 5,400 डॉलर प्रति औंस कर दिया है, जो पहले 4,900 डॉलर था. अपनी रिपोर्ट में गोल्डमैन सैक्स ने कहा, “हम मानते हैं कि निजी क्षेत्र के निवेशक, जो वैश्विक नीति जोखिम से बचाव के लिए सोना खरीदते हैं, 2026 में अपनी होल्डिंग नहीं बेचेंगे. इससे हमारे मूल्य अनुमान की शुरुआती आधार कीमत ऊपर उठती है.”
इसके अलावा गोल्डमैन सैक्स को उम्मीद है कि पश्चिमी देशों के ईटीएफ में निवेश बढ़ेगा, क्योंकि अमेरिकी फेडरल रिजर्व 2026 में ब्याज दरों में करीब 50 बेसिस प्वाइंट की कटौती कर सकता है. इसका मतलब यह हुआ कि भले ही फिलहाल गिरावट दिख रही हो, लेकिन लंबे समय में सोने की चमक बनी रह सकती है. आम निवेशकों के लिए संदेश यही है कि केवल खबरों के आधार पर जल्दबाजी में फैसले न लें, बल्कि लंबी अवधि की रणनीति और जोखिम समझकर ही निवेश करें.
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