डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड का समर्थन करने वाले आठ यूरोपीय देशों पर 1 फरवरी से 10 प्रतिशत का टैरिफ लगाने की घोषणा की है. ट्रंप की इस ‘जबरन वसूली’ वाली कूटनीति ने दशकों पुराने नाटो गठबंधन की नींव हिला दी है. अब यूरोपीय संघ ने भी बचाव की मुद्रा छोड़ आक्रामक रुख अपना लिया है. द फाइनेंशियल टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, ब्रुसेल्स में हुई राजदूतों की आपात बैठक में ट्रंप के टैरिफ का मुकाबला करने के लिए 93 अरब यूरो (लगभग 108 अरब डॉलर) के जवाबी टैरिफ की योजना बनाई गई है.
ट्रंप की ग्रीनलैंड जिद
विवाद की जड़ में ट्रंप की वह पुरानी और विवादित इच्छा है, जिसमें वे ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण चाहते हैं. ग्रीनलैंड, जो तकनीकी रूप से डेनमार्क का हिस्सा है, अपनी रणनीतिक स्थिति और प्राकृतिक संसाधनों के कारण अमेरिका की नजर में है. हालांकि, डेनमार्क और वहां के लोगों ने स्पष्ट कर दिया है कि ‘ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है’. जब डेनमार्क और उसके सहयोगी देशों ने अमेरिका के इस प्रस्ताव का विरोध किया, तो ट्रंप ने इसे व्यक्तिगत अपमान की तरह लिया. और ग्रीनलैंड का समर्थन करने वाले आठ यूरोपीय देशों को टैरिफ धमकी दी.
ईयू ने लगाया टैरिफ तो क्या होगा?
अगर यूरोपीय संघ के देश 93 अरब यूरो के जवाबी टैरिफ लगाते हैं तो इससे अमेरिका हिल जाएगा. यह राशि इतनी विशाल है कि यह अमेरिकी अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्रों, जैसे कृषि, ऑटोमोबाइल और टेक्नोलॉजी सेक्टर को हिलाकर रख सकती है. यूरोपीय अधिकारियों का मानना है कि यदि ट्रंप व्यापार नियमों का उल्लंघन करते हैं तो यूरोप के पास अपनी अर्थव्यवस्था की रक्षा के लिए समान स्तर की कार्रवाई करने का पूरा अधिकार है. यह जवाबी कार्रवाई विशेष रूप से उन राज्यों को निशाना बना सकती है जो ट्रंप के राजनीतिक आधार (Vote Bank) माने जाते हैं.
क्या है ‘ट्रेड बाजूका’
यूरोपीय संघ के पास एक ऐसा विध्वंसक आर्थिक हथियार है जिसे ‘एंटी-कोएर्शन इंस्ट्रूमेंट’ (Anti-Coercion Instrument) या व्यापारिक भाषा में ‘ट्रेड बाजूका’ कहा जाता है. यह मूल रूप से चीन जैसे देशों के आर्थिक दबाव से निपटने के लिए बनाया गया था, लेकिन ट्रंप के अड़ियल रुख ने यूरोप को इसे अमेरिका के खिलाफ इस्तेमाल करने पर विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है. इसके तहत कई तरह से अमेरिका पर वार किए जा सकते हैं-
- बाजार पहुंच सीमित करना: अमेरिकी कंपनियों के लिए यूरोपीय संघ के विशाल बाजार (Single Market) में व्यापार करना मुश्किल बनाया जा सकता है.
- निर्यात नियंत्रण: अमेरिका को होने वाले प्रमुख कच्चे माल और हाई-टेक पार्ट्स की सप्लाई रोकी जा सकती है.
- बौद्धिक संपदा (IP) प्रतिबंध: अमेरिकी टेक कंपनियों पर कड़े जुर्माने और नियम थोपे जा सकते हैं.
यह कदम अमेरिका और यूरोप के बीच सदियों पुराने आर्थिक संबंधों को हमेशा के लिए बदल सकता है.
ट्रंप के लिए क्यों महंगा साबित होगा यह कदम?
यदि ट्रंप इस व्यापारिक युद्ध को आगे बढ़ाते हैं, तो इसके परिणाम अमेरिकी उपभोक्ताओं और उद्योगपतियों के लिए विनाशकारी हो सकते हैं. यूरोपीय सामानों पर टैरिफ लगने से अमेरिका में रोजमर्रा की चीजों के दाम बढ़ेंगे. नाटो सहयोगियों के साथ व्यापारिक युद्ध लड़ने से अमेरिका वैश्विक मंच पर अलग-थलग पड़ सकता है. जब यूरोप 108 अरब डॉलर का टैरिफ लगाएगा, तो अमेरिकी निर्यातकों को भारी नुकसान होगा, जिससे बेरोजगारी बढ़ सकती है.
दावोस में आमने-सामने होंगे दिग्गज
स्विट्जरलैंड के दावोस में होने वाला ‘वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम’ इस बार व्यापार युद्ध का अखाड़ा बनने जा रहा है. यूरोपीय नेता इस सप्ताह ट्रंप से मुलाकात करेंगे, लेकिन इस बार उनके पास केवल वार्ता की मेज नहीं, बल्कि कठोर विकल्पों की फाइलें भी होंगी. यूरोपीय संघ के अधिकारियों का कहना है कि वे ट्रंप को यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार कोई ‘प्रॉपर्टी डील’ नहीं है जिसे धमकाकर हासिल किया जा सके.
यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा ने स्पष्ट कहा है कि ट्रंप के कदम अंतरराष्ट्रीय समझौतों के खिलाफ हैं. डेनमार्क, जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे आठ देशों ने भी एकजुट होकर ‘आर्कटिक एंड्योरेंस’ अभ्यास के माध्यम से अपनी सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता का संकल्प दोहराया है.
संप्रभुता की रक्षा को कदम उठाना यूरोप की मजबूरी
यूरोप ने यह संदेश दे दिया है कि वह अपनी और डेनमार्क की संप्रभुता के साथ समझौता नहीं करेगा. ट्रंप की टैरिफ धमकी ने यूरोप को एक ऐसी एकता के सूत्र में बांध दिया है जो शायद पहले कभी नहीं देखी गई. ग्रीनलैंड विवाद अब केवल एक जमीन के टुकड़े की लड़ाई नहीं रह गया है, बल्कि यह इस बात की परीक्षा है कि क्या व्यापार का उपयोग किसी देश की संप्रभुता को खरीदने के लिए किया जा सकता है. अगर ट्रंप अपना फैसला वापस नहीं लेते, तो 1 फरवरी से शुरू होने वाली यह जंग वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए ‘ब्लैक फरवरी’ साबित हो सकती है, जिसका सबसे ज्यादा नुकसान खुद अमेरिका को ही उठाना पड़ेगा.
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