कर्नाटक हाई कोर्ट ने दुर्घटना बीमा क्लेम के एक मामलों का निपटारा करते हुए कहा कि परिवार चलाने में गृहिणी के योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. क्लेम तय करते समय हाउस वाइफ के भविष्य की संभावनाओं को शामिल किया जा सकता है.
कोर्ट ने कहा कि मुआवजे की गणना केवल वर्तमान स्थिति पर नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों में महिला की बढ़ती भूमिका के आधार पर होनी चाहिए.
अदालत ने पीड़िता के पति और दो बेटों द्वारा दायर अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए निर्देश दिया कि आश्रितों को संशोधित मुआवजे के रूप में 10 लाख रुपये दिए जाएं, साथ ही इस राशि पर 6% वार्षिक ब्याज भी दिया जाए. यह फैसला समाज के उस बड़े वर्ग के लिए एक नजीर है जो घर के कामकाज को आर्थिक मूल्य से जोड़कर नहीं देखते. हाई कोर्ट ने साफ कर दिया है कि गृहिणी का श्रम ‘अदृश्य’ जरूर हो सकता है, लेकिन वह परिवार की रीढ़ होता है.
क्या है पूरा मामला?
21 अक्टूबर 2014 को चेलुवाम्बा अरासु नामक महिला अपने परिवार के साथ कार में सफर कर रही थी. बेंगलुरु-मैसूरु रोड पर एक ट्रक की टक्कर में उनकी मृत्यु हो गई. इस हादसे ने एक पति से उसकी पत्नी और दो बेटों से उनकी मां को छीन लिया. मैसूरु के मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल ने 2019 में इस मामले पर 7.6 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था. हालांकि, परिवार ने इस राशि को महिला के योगदान के मुकाबले अपर्याप्त मानते हुए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया.
उम्र और अनुभव के साथ बढ़ती है गृहिणी की ‘वैल्यू’
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति तारा गंजू ने कहा कि गृहिणी के मामले में भी मुआवजे का आकलन करते समय ‘भविष्य की संभावनाओं’ (Future Prospects) को जोड़ा जाना अनिवार्य है. कोर्ट ने तर्क दिया कि जैसे-जैसे एक गृहिणी की उम्र और अनुभव बढ़ता है, परिवार के प्रबंधन में उसकी दक्षता और परिपक्वता भी स्वाभाविक रूप से बढ़ती जाती है.
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