अमेरिका और भारत के बीच व्यापारिक रिश्तों में टैरिफ की दीवार खड़ी होने से लगभग 80 अरब डॉलर के निर्यात पर संकट है. हालांकि, भारत के पास अमेरिका के साथ ट्रेड सरप्लस है, लेकिन नई नीतियों से इसे नुकसान हो सकता है. ऐसे में यूरोपीय संघ (EU) के साथ आगामी FTA से होने वाला 50 अरब डॉलर का संभावित सरप्लस भारत के लिए एक बड़े ‘इकोनॉमिक कुशन’ की तरह काम करेगा.
वित्त वर्ष 2023-24 और 2024-25 के शुरुआती आंकड़ों के अनुसार
1. कुल व्यापार: भारत और अमेरिका के बीच सालाना करीब 120 से 130 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार होता है.
2. भारत का निर्यात (Export): भारत अमेरिका को सालाना लगभग 78-80 अरब डॉलर का सामान और सेवाएं बेचता है. इसमें स्मार्टफोन, दवाइयां, हीरे और टेक्सटाइल प्रमुख हैं.
3. भारत का आयात (Import): भारत वहां से करीब 40-45 अरब डॉलर का सामान (जैसे कच्चा तेल, विमान के पुर्जे) खरीदता है.
4. ट्रेड सरप्लस: भारत अमेरिका के साथ लगभग 35-38 अरब डॉलर के ट्रेड सरप्लस में है. यानी हम उन्हें 35 अरब डॉलर का सामान ज्यादा बेचते हैं.
यूएस टैरिफ का असर और यूरोपीय संघ (EU) से भरपाई
अमेरिका ने यदि भारतीय उत्पादों पर 10-20% का अतिरिक्त टैरिफ लगाया, तो भारत के 80 अरब डॉलर के निर्यात की लागत बढ़ जाएगी, जिससे मांग में गिरावट आ सकती है. अब यहां यूरोपीय संघ (EU) के साथ होने वाले FTA की भूमिका अहम हो जाती है
- $50 बिलियन का सहारा: मनीकंट्रोल की रिपोर्ट के अनुसार, 27 जनवरी को होने वाले EU FTA से वित्त वर्ष 2031 तक भारत के ट्रेड सरप्लस में 50 अरब डॉलर की बढ़ोतरी का अनुमान है.
- भरपाई का गणित: अमेरिका के साथ भारत का कुल ट्रेड सरप्लस अभी करीब 35-38 अरब डॉलर है. यदि अमेरिकी टैरिफ के कारण इस सरप्लस में 30-40% की भी गिरावट आती है (लगभग 12-15 अरब डॉलर का नुकसान), तो यूरोपीय संघ से मिलने वाला 50 अरब डॉलर का अतिरिक्त सरप्लस न केवल इस नुकसान की पूरी भरपाई कर देगा, बल्कि भारत की कुल वैश्विक कमाई को 30-35 अरब डॉलर और बढ़ा देगा.
क्या यह पूरी तरह संतुलित है?
मनी टर्म्स में देखें तो $50 बिलियन का सरप्लस $35 बिलियन के अमेरिकी सरप्लस से बड़ा है. लेकिन इसमें एक पेच है. अमेरिका भारत के लिए ‘नेट डॉलर अर्नर’ है. अगर अमेरिका में 80 अरब डॉलर का निर्यात गिरता है, तो उसे डाइवर्ट करना बड़ी चुनौती होगी. विशेषज्ञों के अनुसार, भारत अपने अमेरिकी निर्यात का लगभग 84% ($67.2 बिलियन) हिस्सा यूरोपीय बाजारों की ओर मोड़ सकता है. यानी, अगर अमेरिका के दरवाजे थोड़े बंद होते हैं, तो यूरोप के दरवाजे खुलने से भारत की विदेशी मुद्रा की कमाई (Forex Earnings) स्थिर बनी रहेगी.
इंश्योरेंस पॉलिसी जैसा ईयू डील
सरल शब्दों में, अमेरिका से होने वाला मुनाफा अगर टैरिफ की भेंट चढ़ता है, तो यूरोपीय संघ के साथ यह डील भारत के व्यापारिक घाटे को बढ़ने से रोक लेगी. यह 50 अरब डॉलर का सरप्लस भारत के लिए एक ‘इंश्योरेंस पॉलिसी’ जैसा है, जो अमेरिकी अनिश्चितता के दौर में देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती देगा.
About the Author

जय ठाकुर 2018 से खबरों की दुनिया से जुड़े हुए हैं. 2022 से News18Hindi में सीनियर सब एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं और बिजनेस टीम का हिस्सा हैं. बिजनेस, विशेषकर शेयर बाजार से जुड़ी खबरों में रुचि है. इसके अलावा दे…और पढ़ें
Discover more from Business News
Subscribe to get the latest posts sent to your email.