भारतीय बाजार में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) का कुल एसेट्स अंडर कस्टडी (AUC) एक महत्वपूर्ण इंडिकेटर है, जो उनके कुल निवेश की वैल्यू दिखाता है. दिसंबर 2024 के अंत में FPIs का AUC लगभग 831 बिलियन डॉलर था. उस समय के एक्सचेंज रेट पर करीब 70 लाख करोड़ रुपये. लेकिन 2025 में लगातार बिकवाली और बाजार की कमजोरी के चलते ये दिसंबर 2025 तक गिरकर करीब 814 बिलियन डॉलर रह गया. एक्सचेंज रेट के हिसाब से करीब 73 लाख करोड़ रुपये. एक साल में ये वैल्यू में करीब 17 बिलियन डॉलर की कमी आई, जो नेट आउटफ्लो और मार्केट वैल्यूएशन के गिरने का नतीजा है.
2025 में FPIs ने रिकॉर्ड 1.58 लाख करोड़ रुपये (करीब 18.4 बिलियन डॉलर) की नेट बिकवाली की, जो भारतीय बाजार के इतिहास में सबसे ज्यादा है. दिसंबर 2025 में ही उन्होंने 22,130 करोड़ रुपये की बिकवाली की. इसके विपरीत, 2024 में दिसंबर महीने में FPIs ने 24,454 करोड़ रुपये की नेट खरीदारी की थी, जो बाजार को बूस्ट दे रही थी.
रुपये की गिरावट: विदेशी निवेशकों के लिए बड़ा झटका
ऊपर जो रुपयों के हिसाब से विदेशी निवेश की वैल्यू बन रही है, वह देखने में भला ही ज्यादा लग रही हो, लेकिन ये गिरते रुपये का असर है. भारतीय रुपया 2025 में लगातार कमजोर हुआ. दिसंबर 2024 के अंत में USD/INR एक्सचेंज रेट करीब 85.5 था, यानी 1 डॉलर के बदले 85.5 रुपये. लेकिन दिसंबर 2025 तक ये बढ़कर 90 के आसपास पहुंच गया, कुछ दिनों में तो 91.96 तक छू लिया. ये करीब 5-6% की गिरावट है, जो FPIs के लिए बड़ा नुकसान है.
ऐसा इसलिए, क्योंकि FPIs अपना निवेश डॉलर में मापते हैं. अगर वे भारत में शेयर खरीदते हैं तो रुपये में कन्वर्ट करते हैं, और बेचते समय रुपये को वापस डॉलर में बदलते हैं. रुपये की गिरावट से उनके रिटर्न घट जाते हैं. उदाहरण के लिए, मान लीजिए एक FPI ने 2024 में 100 डॉलर से शेयर खरीदे, जो उस समय 8500 रुपये बनते थे. अगर 2025 में वो शेयर बेचकर 8500 रुपये ही मिलते हैं, न कम, न ज्यादा, तो डॉलर में कन्वर्ट करने पर सिर्फ 94 डॉलर (90 रेट पर) मिलेंगे, यानी 6 प्रतिशत का नुकसान सिर्फ करेंसी के घटने से हो जाएगा.
डबल लॉस का खेल भी समझिए
FPIs के लिए 2025 डबल लॉस का साल रहा. पहला लॉस तो शेयरों की कीमतों से हुआ. लगातार बिकवाली से निफ्टी और सेंसेक्स जैसे इंडेक्सेस में गिरावट आई, जिससे FPIs को सस्ते में शेयर बेचने पड़े. फाइनेंशियल सेक्टर में ही 53,942 करोड़ रुपये की बिकवाली हुई. दूसरा लॉस रुपये की डेप्रिशिएशन से हो गया. शेयर बेचने के बाद जब वे रुपये को डॉलर में कन्वर्ट करते हैं, तो वैल्यू और कम हो जाती है.
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, रुपये की 4-6 फीसदी गिरावट ने FPIs के डॉलर रिटर्न को 10-15 फीसदी तक घटा दिया. ग्लोबल फैक्टर्स जैसे यूएस फेड की रेट कट्स, चीन की रिकवरी और भारत का ट्रेड डेफिसिट (दिसंबर 2025 में 25 बिलियन डॉलर) ने रुपये की कीमत को कमजोर बनाने का काम किया. नतीजा ये हुआ कि FPIs ने 8 महीनों में नेट सेलिंग की, और उनके कुल रिटर्न नेगेटिव हो गए. डोमेस्टिक इन्वेस्टर्स (DIIs) ने 86 बिलियन डॉलर की खरीदारी से बाजार को सपोर्ट करने की कोशिश की, लेकिन लेकिन FPIs के बिना बाजार में हरा रंग नजर नहीं आया.
2026 में अगर यूएस-इंडिया ट्रेड डील मजबूत होती है और भारत की GDP ग्रोथ 8 प्रतिशत के आसपास रहती है, तो FPIs की वापसी हो सकती है. लेकिन फिलहाल, रुपये की कमजोरी और हाई वैल्यूएशंस से सावधानी बरतनी होगी.
Discover more from Business News
Subscribe to get the latest posts sent to your email.