मनीकंट्रोल की रिपोर्ट के अनुसार, FY25 में भारत का यूरोपियन यूनियन को सबसे ज्यादा एक्सपोर्ट रिफाइंड पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स का था, जो 15 बिलियन डॉलर का था. इसके बाद इलेक्ट्रॉनिक गुड्स 11.3 बिलियन डॉलर के थे. टेक्सटाइल और अपैरल 7.6 बिलियन, मशीनरी और कंप्यूटर्स 5 बिलियन, ऑर्गेनिक केमिकल्स 5.1 बिलियन, आयरन और स्टील 4.9 बिलियन, फार्मास्यूटिकल्स 3 बिलियन और जेम्स एंड ज्वेलरी 2.5 बिलियन डॉलर के थे. ऑटोमोटिव सेक्टर में भी 2.2 बिलियन डॉलर का एक्सपोर्ट था, जिसमें ऑटो पार्ट्स, ट्रैक्टर्स, मोटरसाइकिल, स्कूटर, डंपर और कारें शामिल हैं. इसके अलावा टायर्स, फुटवियर और कॉफी जैसे लेबर-इंटेंसिव प्रोडक्ट्स भी अहम हैं.
कब से लागू होगी ट्रेड पॉलिसी?
दोनों तरफ का कुल ट्रेड FY25 में 136 बिलियन डॉलर से ज्यादा था. भारत ने यूरोपियन यूनियन से 60.7 बिलियन डॉलर का सामान इम्पोर्ट किया, जिसमें हाई-एंड मशीनरी जैसे टर्बोजेट्स और स्पेशलाइज्ड इंडस्ट्रियल मशीनें मुख्य थीं. ये FTA अभी साइन होने के बाद लागू होने में कम से कम एक साल लग सकता है. टैरिफ कम होने या खत्म होने के फायदे तभी मिलेंगे जब डील पूरी तरह लागू हो जाएगी. ये अनुमान ट्रेड पॉलिसी के स्टैंडर्ड तरीके से लगाया गया है, जो सरकारें, WTO और UNCTAD जैसे संगठन इस्तेमाल करते हैं.
यूरोपीय कारों पर आयात शुल्क में बड़ी कटौती
सूत्रों और रॉयटर्स के अनुसार, प्रस्तावित समझौते का सबसे ध्यान खींचने वाला हिस्सा यह है कि भारत यूरोपीय कारों पर आयात शुल्क में बड़ी कटौती करने को तैयार है. वर्तमान में पूरी तरह बनी कारों (Fully Built Cars) पर 70% से 110% तक टैक्स लगता है. प्रस्ताव के अनुसार, 15,000 यूरो से अधिक कीमत वाली कुछ EU-निर्मित कारों पर पीक ड्यूटी तुरंत 40% तक कम हो सकती है, और समय के साथ इसे धीरे-धीरे 10% तक लाया जा सकता है.
सूत्रों के मुताबिक, शुरुआती कटौती सालाना करीब 2 लाख इंटर्नल कंबशन इंजन (ICE) वाहनों पर लागू हो सकती है, हालांकि अंतिम कोटा अभी तय नहीं हुआ है. पहले पांच सालों तक बैटरी इलेक्ट्रिक वाहन (BEV) इस योजना से बाहर रहेंगे ताकि घरेलू निवेश सुरक्षित रहे. इससे Volkswagen, Mercedes-Benz और BMW जैसी यूरोपीय ऑटो कंपनियों के लिए भारत का अत्यधिक संरक्षित ऑटो मार्केट खुल सकता है—ऐसा कदम जो पहले राजनीतिक रूप से लगभग असंभव माना जाता था.
ये डील भारत के लिए बहुत फायदेमंद हो सकती है क्योंकि इससे टेक्सटाइल, फार्मा, जेम्स जैसे सेक्टर्स में यूरोपियन मार्केट आसानी से मिलेगा. यूरोपियन कंपनियों को भी भारत में बेहतर एक्सेस मिलेगा. कुल मिलाकर ये दोनों देशों के बीच आर्थिक रिश्तों को मजबूत करेगा और व्यापार को बढ़ावा देगा. भारत की इकोनॉमी को बूस्ट मिलेगा और रोजगार के नए मौके भी बन सकते हैं. लेकिन फायदे आने में समय लगेगा, इसलिए सब कुछ धीरे-धीरे होगा. ये लंबी बातचीत का अच्छा नतीजा है जो भारत की ग्रोथ को नई दिशा दे सकता है.
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