पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष के बीच भारतीय निर्यातकों को राहत देने के लिए केंद्र सरकार नई योजना पर विचार कर रही है. सरकार Export Promotion Mission में बदलाव कर अतिरिक्त प्रोत्साहन देने की संभावना भी देख रही है. निर्यातकों का कहना है कि अगर संघर्ष लंबा चला तो शिपिंग, बीमा और ऊर्जा लागत बढ़ने से व्यापार पर असर पड़ सकता है.
सरकारी अधिकारी ने बताया कि सरकार ऐसी नई योजना पर काम कर रही है जो मौजूदा हालात में दबाव झेल रहे निर्यातकों को राहत दे सके. उन्होंने यह भी संकेत दिया कि Export Promotion Mission में बदलाव कर निर्यातकों के लिए कुछ अतिरिक्त प्रोत्साहन दिए जा सकते हैं. हालांकि इस बारे में अंतिम फैसला इस बात पर निर्भर करेगा कि आने वाले दिनों में मिडिल ईस्ट में हालात किस दिशा में जाते हैं.
एक्सपोर्ट प्रमोशन मिशन क्या है
एक्सपोर्ट प्रमोशन मिशन केंद्र सरकार की एक प्रमुख पहल है, जिसका उद्देश्य निर्यात क्षेत्र को समग्र समर्थन देना है. नवंबर 2025 में मंजूर इस मिशन के तहत निर्यात से जुड़े कई अहम पहलुओं को एक ही ढांचे में लाने की कोशिश की गई है. इसमें ट्रेड फाइनेंस, गुणवत्ता मानक, लॉजिस्टिक्स, विदेशी वेयरहाउसिंग और नए बाजारों के विकास जैसे क्षेत्र शामिल हैं. सरकारी जानकारी के मुताबिक वित्त वर्ष 2025–26 से 2030–31 के बीच इस मिशन पर कुल 25,060 करोड़ रुपये खर्च किए जाने का प्रावधान है.
दो प्रमुख योजनाओं के जरिए लागू
Export Promotion Mission को दो प्रमुख उप योजनाओं के जरिए लागू किया जा रहा है. पहली योजना Niryat Protsahan है, जो मुख्य रूप से वित्तीय सहायता और ट्रेड फाइनेंस जैसे पहलुओं पर केंद्रित है. दूसरी योजना Niryat Disha है, जिसका उद्देश्य बाजार तक पहुंच बढ़ाना, व्यापारिक ढांचे को मजबूत करना और निर्यात पारिस्थितिकी तंत्र को बेहतर बनाना है.
निर्यातकों में बढ़ी चिंता
इंजीनियरिंग निर्यात प्रोत्साहन परिषद के चेयरमैन पंकज चड्ढा ने मौजूदा स्थिति को निर्यात समुदाय के लिए काफी चिंताजनक बताया है. उन्होंने कहा कि इंजीनियरिंग सामान के लिए सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात भारत के अहम बाजार हैं. इसके अलावा यही देश पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका क्षेत्र के बड़े बाजारों तक पहुंच का एक प्रमुख प्रवेश द्वार भी माने जाते हैं.
लॉजिस्टिक्स और बीमा लागत बढ़ने का खतरा
Federation of Indian Export Organisations के अध्यक्ष एस सी राल्हन के अनुसार मौजूदा संघर्ष ने वैश्विक लॉजिस्टिक्स चैनलों को प्रभावित करना शुरू कर दिया है. भू राजनीतिक जोखिम बढ़ने पर समुद्री बीमा प्रीमियम आम तौर पर बढ़ जाते हैं. इससे निर्यातकों के लिए व्यापार की लागत भी बढ़ जाती है.
ऊर्जा कीमतें बढ़ने से और दबाव
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर संघर्ष लंबा चला तो वैश्विक ऊर्जा कीमतों पर भी दबाव बढ़ सकता है. ऊर्जा महंगी होने से उत्पादन लागत बढ़ेगी, जिससे निर्यात प्रतिस्पर्धा पर असर पड़ सकता है. इसके साथ ही रुपये पर दबाव और वैश्विक बाजारों में अस्थिरता भी बढ़ सकती है. ऐसे में सरकार और उद्योग दोनों की नजर अब इस बात पर है कि मिडिल ईस्ट में हालात कितनी जल्दी सामान्य होते हैं और वैश्विक व्यापार पर इसका कितना गहरा असर पड़ता है.
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जय ठाकुर 2018 से खबरों की दुनिया से जुड़े हुए हैं. 2022 से News18Hindi में सीनियर सब एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं और बिजनेस टीम का हिस्सा हैं. बिजनेस, विशेषकर शेयर बाजार से जुड़ी खबरों में रुचि है. इसके अलावा दे…और पढ़ें
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