हालांकि इस समझौते में कृषि बाजार को लेकर भारत और अमेरिका के बीच मतभेद भी सामने आए हैं. भारत ने अमेरिका के कृषि उत्पादों के लिए बाजार पूरी तरह खोलने के दबाव का विरोध किया है, लेकिन कुछ कृषि उत्पादों पर ट्रेड बैरियर कम करने पर सहमति जताई है. इस फैसले को लेकर किसान संगठनों और विपक्षी दलों ने चिंता जताई है.
DDGS और सोयाबीन तेल से किसे फायदा, किसे नुकसान
भारत अमेरिका से प्रोटीन रिच डिस्टिलर्स ड्राइड ग्रेन्स विथ सॉल्युबल्स यानी DDGS के आयात की अनुमति दे सकता है, जो कॉर्न और अन्य अनाज से बने एथेनॉल का बायप्रोडक्ट होता है. इससे घरेलू बाजार में पहले से मौजूद सरप्लस और बढ़ सकता है. DDGS की ज्यादा सप्लाई से भारत के करीब 30 अरब डॉलर के पोल्ट्री सेक्टर को फायदा हो सकता है, क्योंकि पोल्ट्री उत्पादन लागत का 60 से 70 प्रतिशत हिस्सा फीड पर खर्च होता है. सस्ता फीड मिलने से पोल्ट्री कंपनियों का खर्च घट सकता है.
लेकिन घरेलू ऑयलसीड प्रोसेसर और सोयाबीन किसान नुकसान में रह सकते हैं, क्योंकि आयात बढ़ने से सोयामील जैसे ऑयलमील की मांग घट सकती है. इससे भारतीय ऑयलसीड कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है और किसान सोयाबीन और मूंगफली छोड़कर मक्का और चावल की खेती की ओर शिफ्ट हो सकते हैं. DDGS सप्लाई बढ़ने से भारत के एथेनॉल उत्पादकों की कमाई भी घट सकती है, क्योंकि घरेलू बाजार में DDGS की कीमतें गिर सकती हैं. पहले ही 20 प्रतिशत बायोफ्यूल ब्लेंडिंग टारगेट पूरा होने के बाद एथेनॉल सेक्टर में मांग धीमी हो रही है.
ड्यूटी फ्री सोयाबीन तेल पर चिंता
अमेरिका से सोयाबीन तेल के ड्यूटी फ्री आयात की संभावना ने भारत में चिंता बढ़ा दी है. हालांकि मौजूदा फ्रेमवर्क के तहत ड्यूटी फ्री आयात केवल टैरिफ रेट कोटा के तहत होगा. तय सीमा से ज्यादा आयात पर सामान्य टैरिफ लगेगा, जिससे घरेलू उत्पादकों को सुरक्षा मिलेगी.
कपास आयात से किसानों पर असर होगा या नहीं
भारत फिलहाल कपास आयात पर 11 प्रतिशत ड्यूटी लगाता है. अगर अमेरिका से ड्यूटी फ्री आयात की अनुमति मिलती है तो घरेलू कपास कीमतों पर दबाव आ सकता है. हालांकि असर सीमित रहने की उम्मीद है, क्योंकि सरकार केवल एक्स्ट्रा लॉन्ग स्टेपल कपास के आयात की अनुमति दे रही है और वह भी कोटा के तहत. भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कपास उत्पादक है, लेकिन टेक्सटाइल इंडस्ट्री की एक्स्ट्रा लॉन्ग स्टेपल कपास की मांग पूरी नहीं कर पाता, इसलिए अमेरिका, मिस्र और ब्राजील से आयात करता है.
सेब और ड्राई फ्रूट आयात से डर क्यों कम है
भारत दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा सेब उत्पादक है, लेकिन बढ़ती मांग के मुकाबले घरेलू सप्लाई कम है. भारत हर साल करीब पांच लाख मीट्रिक टन सेब आयात करता है. ट्रेड डील के तहत अमेरिका से सेब 25 प्रतिशत रियायती ड्यूटी और 80 रुपये प्रति किलो मिनिमम इंपोर्ट प्राइस पर आएंगे. इससे 100 रुपये प्रति किलो से कम कीमत पर सेब की डंपिंग रुकेगी और भारतीय किसानों को सुरक्षा मिलेगी. ड्राई फ्रूट जैसे अखरोट, बादाम और पिस्ता की खपत भी बढ़ रही है, लेकिन घरेलू उत्पादन सीमित है. इसलिए रियायती आयात से स्थानीय किसानों पर बड़ा असर पड़ने की संभावना नहीं है.
किन किसानों को मिल सकता है बड़ा फायदा
चाय, कॉफी, मसाले और फलों के भारतीय किसानों को इस ट्रेड डील से फायदा मिल सकता है, क्योंकि अमेरिका ने इन उत्पादों को ड्यूटी फ्री एक्सेस देने पर सहमति जताई है. चावल पर आयात शुल्क घटाकर 18 प्रतिशत करने से बासमती और नॉन बासमती चावल निर्यातकों को भी सपोर्ट मिल सकता है.
किसानों के लिए क्या है बड़ी तस्वीर
कुल मिलाकर यह ट्रेड डील कुछ सेक्टरों के लिए बड़ा मौका लेकर आ रही है, लेकिन कुछ किसानों के लिए कीमतों और आयात दबाव का जोखिम भी बढ़ा सकती है. आगे डील की फाइनल शर्तों और सेक्टर वाइज डिटेल्स से ही साफ होगा कि यह समझौता भारतीय कृषि के लिए वरदान बनेगा या नई चुनौती.
Discover more from Business News
Subscribe to get the latest posts sent to your email.