मनीकंट्रोल की एक रिपोर्ट के अनुसार, अंतरिम ट्रेड डील के अनुसार, भारत 2,500cc से अधिक क्षमता वाली डीज़ल कारों और 3,000cc से अधिक क्षमता वाली पेट्रोल कारों पर आयात शुल्क (Import Duty) को मौजूदा स्तर से घटाकर 50 फीसदी करने जा रहा है. अगले 10 वर्षों में इसे और कम करके 30 प्रतिशत तक लाया जाएगा. सैद्धांतिक रूप से यह फोर्ड और जीप जैसे ब्रांडों के लिए एक बड़ा मौका है. हालांकि, यह राहत केवल ‘पूरी तरह से निर्मित इकाइयों’ (CBU) पर लागू होगी. लेकिन मुश्किल यह है कि अमेरिकी बाज़ार में बिकने वाली अधिकांश बड़ी कारें भारत के ड्राइविंग मानकों पर खरी नहीं उतरतीं.
लेफ्ट बनाम राइट: ड्राइविंग सीट का महंगा गणित
अमेरिका एक ‘लेफ्ट-हैंड-ड्राइव’ (LHD) बाज़ार है, जबकि भारत ‘राइट-हैंड-ड्राइव’ (RHD) बाज़ार है. भारत में सुरक्षा नियमों के कारण LHD वाहनों का पंजीकरण सामान्य स्थितियों में संभव नहीं है. किसी भी अमेरिकी कार निर्माता के लिए एक विशेष मॉडल की ड्राइविंग सीट को लेफ्ट से राइट की तरफ शिफ्ट करना (Re-engineering) एक अत्यंत खर्चीली और जटिल प्रक्रिया है. कोई भी कंपनी ऐसा निवेश तब तक नहीं करती, जब तक उसे भारत जैसे बाज़ार से हज़ारों की संख्या में ऑर्डर मिलने की गारंटी न हो. यही कारण है कि टैरिफ कम होने के बावजूद अमेरिकी कारों की भारतीय बाज़ार में ‘बाढ़’ आने की संभावना कम है.
फोर्ड मस्टैंग को ही दिक्कत नहीं
अगर इस समझौते का किसी एक कार को सबसे ज़्यादा फायदा मिल सकता है, तो वह है ‘फोर्ड मस्टैंग’. फोर्ड एकमात्र अमेरिकी दिग्गज है जिसके पास 3,000cc से अधिक इंजन वाली ऐसी कार है जो पहले से ही राइट-हैंड-ड्राइव (RHD) कॉन्फ़िगरेशन में वैश्विक स्तर पर उपलब्ध है. मस्टैंग ने 2016 में भारत में अपनी पहचान बनाई थी, लेकिन 2021 में फोर्ड के भारत छोड़ने के बाद यह बंद हो गई. अब नए टैरिफ ढांचे के साथ मस्टैंग की भारत में वापसी सबसे आसान लगती है, क्योंकि इसके लिए कंपनी को कोई नया तकनीकी बदलाव नहीं करना पड़ेगा.
जीप को स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग का लाभ
जीप वर्तमान में भारत में सबसे सक्रिय अमेरिकी ब्रांड है. स्टेलैंटिस (जीप की पैरेंट कंपनी) पुणे के पास अपने प्लांट में पहले से ही रैंगलर और ग्रैंड चेरोकी जैसे मॉडल असेंबल करती है. चूंकि ये कारें ‘कंप्लीटली नॉक्ड डाउन’ (CKD) किट के रूप में आती हैं, इसलिए इन्हें पहले से ही लगभग 15 प्रतिशत के कम शुल्क का लाभ मिल रहा है. नए समझौते से जीप के उन मॉडलों को फायदा हो सकता है जो सीधे अमेरिका से आयात किए जाते हैं, बशर्ते वे 3,000cc से बड़े इंजन वाले हों.
जनरल मोटर्स और कैडिलैक
जनरल मोटर्स (GM) के लिए यह समझौता फिलहाल बेअसर दिख रहा है. हालांकि GM ने ‘कैडिलैक लिरिक’ जैसी इलेक्ट्रिक SUVs का राइट-हैंड-ड्राइव उत्पादन शुरू किया है, लेकिन वे इस विशेष टैरिफ श्रेणी में फिट नहीं बैठतीं. बिना किसी पेट्रोल-डीज़ल RHD मॉडल के, जनरल मोटर्स के लिए भारतीय बाज़ार में वापसी करना एक दूर की कौड़ी नज़र आता है.
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