रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया की बड़ी तेल कंपनियों और ट्रेडिंग हाउसेज ने सुरक्षा कारणों से होरमुज़ के रास्ते कच्चे तेल, ईंधन और एलएनजी की ढुलाई अस्थायी रूप से रोक दी है. यह केवल एक कूटनीतिक तनाव नहीं है, बल्कि समुद्र में खड़े उन अरबों डॉलर के कार्गो का सवाल है जो अब सीधे निशाने पर हैं. शिपिंग डेटा और क्लेपर के आंकड़ों के मुताबिक, कम से कम 11 बड़े एलएनजी टैंकरों ने होरमुज़ के पास अपनी गति धीमी कर दी है या वे वापस मुड़ गए हैं. ओमान के तट के पास विशालकाय तेल टैंकरों की कतारें लग गई हैं. कप्तान और जहाज मालिक अब जोखिम लेने को तैयार नहीं हैं. जहाजों के इस तरह अचानक रुकने या रास्ता बदलने से पूरी सप्लाई चेन चरमरा जाएगी.
भारत के लिए ‘लाइफलाइन’ पर संकट
भारत के लिए यह स्थिति किसी दुःस्वप्न से कम नहीं है. 2026 की शुरुआत में भारत की ऊर्जा जरूरतों का गणित देखें तो आंकड़े डराने वाले हैं. भारत अपने कुल कच्चे तेल आयात का लगभग 50% हिस्सा—जो जनवरी-फरवरी 2026 में करीब 26 लाख बैरल प्रतिदिन रहा है, इसी संकरे होरमुज़ रास्ते से मंगवाता है.
इराक, सऊदी अरब, यूएई और कुवैत जैसे भारत के प्रमुख आपूर्तिकर्ता देश इसी रास्ते पर निर्भर हैं. अगर यह बाधा लंबी खिंचती है, तो भारत की रिफाइनरियों के पास कच्चे तेल का स्टॉक कम होने लगेगा. हालांकि अल्पकाल में पेट्रोल और डीजल की कीमतें शायद न बढ़ें, लेकिन यदि टैंकरों को लंबा रास्ता तय करना पड़ा, तो आयात बिल में होने वाली वृद्धि सीधे तौर पर आम आदमी की जेब और देश के व्यापार घाटे पर असर डालेगी.
कोई सुरक्षा की गारंटी लेने को तैयार नहीं
अमेरिकी नौसेना ने अरब खाड़ी, ओमान की खाड़ी और उत्तरी अरब सागर को ‘सैन्य अभियान क्षेत्र’ घोषित कर दिया है. स्पष्ट संदेश दिया गया है कि वे व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं दे सकते. इसके तुरंत बाद ग्रीस के शिपिंग मंत्रालय और ब्रिटेन के यूकेएमटीओ ने अपने जहाजों को इस रास्ते से दूर रहने की सख्त सलाह दी है. यह स्थिति लगभग वैसी ही है जैसे किसी व्यस्त हाईवे को अचानक सील कर दिया जाए.
केप ऑफ गुड होप: मजबूरी का लंबा रास्ता
जब होरमुज़ का रास्ता असुरक्षित हो जाता है, तो जहाजों के पास एकमात्र विकल्प अफ्रीका के नीचे से ‘केप ऑफ गुड होप’ का चक्कर लगाकर आना बचता है. लेकिन यह विकल्प सुनने में जितना सरल है, आर्थिक रूप से उतना ही महंगा है. इस लंबे रास्ते से आने पर जहाजों को कम से कम 10 से 15 दिन की अतिरिक्त देरी होगी. अधिक ईंधन की खपत और चार्टर शुल्क के कारण मालभाड़ा दरें रातों-रात बढ़ रही हैं. बीमा कंपनियों ने इस क्षेत्र को ‘हाई रिस्क’ घोषित कर दिया है, जिससे वॉर-रिस्क प्रीमियम में भारी बढ़ोतरी हुई है.
कानूनी पचड़े और ‘फोर्स मेज्योर’ का साया
समुद्री व्यापार केवल जहाजों के चलने तक सीमित नहीं है, यह जटिल कानूनी समझौतों पर टिका है. वर्तमान तनाव के कारण कई चार्टरर और कार्गो मालिक ‘फोर्स मेज्योर’ यानी अप्रत्याशित परिस्थितियों का सहारा ले रहे हैं. इसका मतलब है कि वे युद्ध के जोखिम के कारण समय पर डिलीवरी देने की अपनी कानूनी बाध्यता से हाथ खींच रहे हैं.
इसके अलावा, इलेक्ट्रॉनिक नेविगेशन में बाधा (GPS Jamming) की खबरों ने नाविकों के बीच डर और बढ़ा दिया है. हवाई क्षेत्र बंद होने के कारण जहाजों के चालक दल को बदलना और लॉजिस्टिक्स का प्रबंधन करना भी नामुमकिन होता जा रहा है. जोखिम अब केवल जहाजों के डूबने का नहीं, बल्कि अनिश्चितता के उस भंवर का है जिसमें वैश्विक अर्थव्यवस्था फंसती नजर आ रही है.
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