नवंबर 2019 में करन गुप्ता किसी दूसरे मामले में कंपनी की रडार पर आए और उन्हें बर्खास्त कर दिया गया. इसके बाद जब कंपनी ने इंटरनल जांच की तो परतें खुलती चली गईं. एफबीआई की जांच में सामने आया कि जिस पद पर करोड़ों लुटाए गए, वहां से आउटपुट ‘जीरो’ था.
करन गुप्ता ने अपनी पावर का इस्तेमाल कर अपने एक पुराने दोस्त को डेटा इंजीनियरिंग के बड़े पद पर बिठा दिया. (Photo: AI)
नवंबर 2019 में गुप्ता किसी दूसरे मामले में कंपनी की रडार पर आए और उन्हें बर्खास्त कर दिया गया. इसके बाद जब कंपनी ने इंटरनल जांच की, तो परतें खुलती चली गईं. एफबीआई (FBI) की जांच में सामने आया कि जिस पद पर करोड़ों लुटाए गए, वहां से आउटपुट ‘जीरो’ था. छह दिनों तक चली अदालती सुनवाई के बाद, अब करन गुप्ता को धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग की साजिश का दोषी करार दिया गया है.
साल 2015 में शुरू हुआ खेल
इस धोखाधड़ी की शुरुआत साल 2015 में हुई. करन गुप्ता ने अपनी पावर का इस्तेमाल कर अपने एक पुराने दोस्त को डेटा इंजीनियरिंग के बड़े पद पर बिठा दिया. मजे की बात यह है कि उस दोस्त को डेटा का ‘ड’ भी नहीं पता था. गुप्ता जी ने खुद ही उसका ‘फर्जी बायोडाटा’ तैयार किया. दोस्त को नौकरी मिली, एक लाख डॉलर ( आज के हिसाब से करीब 90 लाख रुपये) से ज्यादा का शुरुआती पैकेज मिला और मजे की बात यह रही कि बॉस भी खुद करन गुप्ता ही बन गए. अब जब बॉस यार हो, तो काम की क्या दरकार? अगले चार सालों तक उस दोस्त ने कंपनी के लिए एक ईमेल तक नहीं भेजा और हफ्तों तक कंप्यूटर लॉगिन करने की जहमत भी नहीं उठाई.
कंपनी को लगाया 10 करोड़ का चूना
गुप्ता ने कंपनी को सिर्फ एक अयोग्य कर्मचारी नहीं दिया, बल्कि उसे 1.2 मिलियन डॉलर (लगभग 10 करोड़ रुपये) का तगड़ा चूना लगाया. यह कोई मुफ्त की समाज सेवा नहीं थी. इस दोस्ती के पीछे एक गहरी ‘सेटिंग’ थी. दोस्त को जो सैलरी बिना काम किए मिलती थी, उसका आधा हिस्सा वह चुपचाप गुप्ता की जेब में डाल देता था. जैसे-जैसे साल बीते, वेतन बढ़ा, बोनस मिला और उसी अनुपात में गुप्ता का ‘कमीशन’ भी बढ़ता गया. कंपनी को लगा कि उनका डेटा एनालिटिक्स विभाग कमाल कर रहा है, जबकि असल में वहां सिर्फ ‘डॉलर एनालिटिक्स’ का खेल चल रहा था.
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