हम बात कर रहे हैं एलुमीनियम सेक्टर की. जहां देश की सबसे बड़ी सरकारी कंपनी नेशनल एल्युमिनियम कंपनी लिमिटेड (NALCO) काम करती है. नाल्को के प्रबंध निदेशक बृजेंद्र प्रताप सिंह का कहना है कि अभी तक इस कंपनी पर अमेरिकी टैरिफ का कोई असर नहीं पड़ा है. यह कंपनी अमेरिका को सीधे कोई निर्यात नहीं करती है और इसके प्रोक्ट की डिमांड भारत सहित दुनियाभर के देशों में है. यूरोपीय यूनियन ने भी भारत के साथ मुक्त व्यापार समझौते में इस प्रोडक्ट पर कार्बन टैक्स लगाने की बात कही है.
एल्यूमीनियम सेक्टर को सरकार से क्या चाहिए
कंपनी के एमडी ने बताया कि जहां तक एल्युमिनियम सेक्टर की बात है, इसकी मांग मुख्य रूप से पावर और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी है. 1 फरवरी को आने वाले बजट से भी हम इंफ्रास्ट्रक्चर और पावर सेक्टर के लिए पर्याप्त फंडिंग की उम्मीद कर रहे हैं. अगर इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार होता है तो पावर की मांग भी बढ़ेगी. ये दोनों सेक्टर बहुत महत्वपूर्ण हैं. लिहाजा अगर फंडिंग और ग्रोथ मिलती है तो एल्युमिनियम की जरूरत भी बनी रहेगी.
कैसा रहा कंपनी का प्रदर्शन
कंपनी को हुई रिकॉर्ड कमाई कंपनी ने पिछले वित्तवर्ष में दमदार प्रदर्शन किया है. नाल्को का मुनाफा वित्तवर्ष 25 में रिकॉर्ड लेवल पर पहुंच गया. इसके बाद चालू वित्तवर्ष की पहली छमाही में फिजिकल प्रदर्शन अब तक का सबसे अच्छा रहा है. वित्तीय प्रदर्शन के मामले में भी, हमने पहली छमाही में अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन किया है, जो वित्तवर्ष 2025 से बेहतर है. राजस्व में करीब 18-19 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है और मुनाफा लगभग 47 प्रतिशत बढ़ा है. अगर अगले दो से तीन महीनों में एल्यूमीनियम की कीमतें $2,800–2,900 प्रति मीट्रिक टन के आसपास रहती हैं, तो हमें उम्मीद है कि इस साल हमारा वित्तीय प्रदर्शन पिछले साल के बराबर रहेगा.
कहां निर्यात होता है भारतीय एल्यूमिनियम
नाल्को अमेरिका को सीधे न तो धातु का निर्यात करता है और न ही रसायन का. इस कंपनी से ज्यादातर निर्यात मध्य पूर्व, यूरोप और दक्षिण पूर्व एशिया में होता है. इस सेक्टर की निजी कंपनियां जैसे वेदांता और हिंडाल्को सीधे अमेरिका को निर्यात करती हैं. अगर उनके निर्यात में कमी आती है और ज्यादा एल्यूमिनियम घरेलू बाजार में आ जाता है, तो इससे कीमतों पर दबाव बन सकता है. फिलहाल भारत में घरेलू मांग मजबूत है. लगभग 40 फीसदी एल्यूमिनियम की खपत बिजली क्षेत्र से होती है. 10–12 फीसदी इंफ्रास्ट्रक्चर से और 6–7 फीसदी ऑटोमोबाइल्स से होती है. सोलर पावर भी मांग बढ़ा रहा है. ये सभी सेक्टर बढ़ रहे हैं, इसी वजह से हमें भारत में अच्छे दाम मिल रहे हैं.
ईयू ने डाला है पेच
यूरोपीय संघ ने कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) लागू किया है. इसका भारतीय एल्यूमिनियम निर्यात पर क्या असर पड़ सकता है, क्योंकि एल्यूमिनियम सेक्टर अभी ग्रीन एल्यूमिनियम के लिए तैयार नहीं है. एल्यूमिनियम एक बहुत ही पावर-इंटेंसिव सेक्टर है. अगर बिजली की लागत तेजी से बढ़ती है, तो एल्यूमिनियम की कुल लागत भी काफी बढ़ जाएगी. इसमें थोड़ा समय लगेगा. हमारे लगभग 80 फीसदी कार्बन उत्सर्जन पावर प्लांट से आते हैं. अगर हमें उत्सर्जन कम करना है, तो थर्मल पावर पर निर्भरता घटाना और ग्रीन पावर की ओर बढ़ना जरूरी है.
अक्षय ऊर्जा ही एकमात्र विकल्प
नाल्को एमडी का कहना है कि हम नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादकों के साथ दीर्घकालिक पावर खरीद समझौतों की संभावना तलाश रहे हैं. हमने एक सलाहकार को भी नियुक्त किया है, जो हमारे लिए एक व्यापक दीर्घकालिक रणनीति तैयार करेगा. हमारा उद्देश्य है कि हमारी मौजूदा खपत, जो लगभग 800–900 मेगावाट है, उसमें से करीब 200–300 मेगावाट चौबीसों घंटे ग्रीन पावर सुनिश्चित की जाए. इसका मतलब होगा कि हमारी कुल बिजली का 20–30 फीसदी हिस्सा ग्रीन स्रोतों से आएगा. इस बदलाव में अगले तीन से चार साल लग सकते हैं.
अभी ग्रीन पॉवर सबसे बड़ी बाधा क्या है
देश में अभी ग्रीन पॉवर चौबीसों घंटे उपलब्ध नहीं है. एल्युमिनियम स्मेल्टिंग के लिए लगातार और स्थिर बिजली जरूरी है. बिजली आपूर्ति में कोई भी बाधा स्मेल्टर के संचालन और दीर्घकालिक उत्पादन पर गंभीर असर डालती है. इसी वजह से चौबीसों घंटे ग्रीन पावर बेहद जरूरी है. हालांकि, बैटरी स्टोरेज के साथ ग्रीन पावर अभी भी महंगी है और तत्काल समाधान उपलब्ध नहीं है. इसी कारण हमने सलाहकार को अलग-अलग विकल्पों स्टोरेज के साथ सौर, सौर और पवन, या स्टोरेज के साथ हाइब्रिड मॉडल का मूल्यांकन करने का जिम्मा दिया है, ताकि व्यवहारिक विकल्पों की पहचान की जा सके.
परमाणु ऊर्जा से बढ़ेगी एल्युमीनियम की डिमांड
सरकार ने निजी कंपनियों के लिए भी परमाणु ऊर्जा का रास्ता खोल दिया है. हालांकि, परमाणु ऊर्जा में पूंजी निवेश बहुत ज्यादा है. थर्मल पावर की लागत लगभग 6-7 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट होती है, जबकि परमाणु ऊर्जा की लागत करीब 30 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट है. यह बहुत बड़ी पूंजी की डिमांड करता है, जिससे बिजली की लागत और साथ ही एल्युमिनियम की लागत भी काफी बढ़ जाएगी. भारत में बड़े पैमाने पर परमाणु ऊर्जा अभी पूरी तरह साबित नहीं हुई है. हमारे प्रतिस्पर्धी देशों जैसे चीन और कनाडा में हाइड्रोपावर पर काफी निर्भरता है, जो सस्ती, ग्रीन और चौबीसों घंटे उपलब्ध है. इससे उन्हें बड़ा फायदा मिलता है.भारत में इतनी बड़ी मात्रा में हाइड्रोपावर उपलब्ध नहीं है, जो हमारे लिए एक चुनौती है. हाइड्रोपावर चौबीसों घंटे बिजली दे सकता है.
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