एक्सपर्ट का कहना है कि नवजात बच्चों के फूड प्रोडक्ट बनाने वाली कंपनी के खिलाफ इस तरह के सवाल उठना उसकी साख पर सीधा असर डाल सकती है. इसका असर कंपनी की मार्केट वैल्यू और उसके ग्रोथ पर भी पड़ सकता है. हालांकि, नेस्ले का दावा है कि भारत में उसके प्रोडक्ट पूरी तरह सुरक्षित हैं, जो एफएसएसएआई के मानकों के हिसाब से तैयार किए जाते हैं. ग्लोबल मार्केट से प्रोडक्ट वापस मंगाने का भारतीय बाजार पर असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि यहां बिकने वाले कंपनी के प्रोडक्ट पूरी तरह सुरक्षित हैं.
क्यों वापस मंगाए जा रहे प्रोडक्ट
नेस्ले के प्रोडक्ट को लेकर दो तरह के सवाल उठ रहे हैं, एक उभरते बाजारों में अतिरिक्त चीनी वाले प्रोडक्ट बेचने को लेकर विवाद और दूसरा दूषित प्रोडक्ट बेचने का मामला. इन दो मामलों ने कंपनी की सबसे संवेदनशील श्रेणी यानी बेबी फूड प्रोडक्ट पर दबाव डाल दिया है और प्रबंधन का ध्यान उपभोक्ता विश्वास को फिर से बनाने पर केंद्रित कर दिया है. इस चुनौती के केंद्र में भारत है. यह देश नेस्ले के प्रमुख सेरेलैक बाजारों में शामिल है और शिशु पोषण की मांग के लिए एक बड़ा मार्केट भी. इस क्षेत्र पर नजर रखने वाले विश्लेषकों का कहना है कि भले ही संचालन पर असर सीमित हो, लेकिन शिशु आहार श्रेणियों में विश्वास से जुड़ी समस्याएं ब्रांड की छवि, डॉक्टरों की सिफारिश और अंत में बाजार हिस्सेदारी को समय के साथ प्रभावित कर सकती हैं.
क्या है कंपनी के खिलाफ मुद्दा
नेस्ले के प्रोडक्ट को लेकर पहला मुद्दा उत्पाद निर्माण से जुड़ा है. साल 2024 में एनजीओ पब्लिक आई और इंटरनेशनल बेबी फूड एक्शन नेटवर्क (IBFAN) की एक जांच में पाया गया कि नेस्ले ने भारत, नाइजीरिया और फिलीपींस जैसे देशों में शिशु उत्पाद जैसे सेरेलैक और नीडो में अतिरिक्त चीनी मिलाकर बेचा है. यूरोप के कुछ हिस्सों में बिकने वाले ऐसे ही उत्पादों में कोई अतिरिक्त चीनी नहीं थी. IBFAN 168 देशों में फैले 270 से अधिक जनहित समूहों का एक वैश्विक नेटवर्क है, जो दुनियाभर में शिशुओं और छोटे बच्चों की बीमारियों और मृत्यु दर को कम करने के लिए काम करता है.
क्या बोली थी कंपनी
नेस्ले ने शुरू में कहा था कि वह हर बाजार में स्थानीय नियमों का पालन करता है, लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों और उपभोक्ता समूहों की आलोचना जारी रही. साल 2025 के अंत तक कंपनी ने भारत में सेरेलैक के 14 वेरिएंट्स से अतिरिक्त चीनी हटा दी और कहा कि वह अन्य बाजारों में भी इसी तरह के बदलाव पर काम कर रही है. हालांकि, कंपनी ने कुछ देशों में चीनी की मात्रा कम करने के लिए उत्पादों के फॉर्मूले में बदलाव किया. इंटरनेशनल बेबी फूड एक्शन नेटवर्क की एक नई जांच में कहा गया है कि अफ्रीकी महाद्वीप में नेस्ले के बेबी फूड में खतरनाक स्तर तक अतिरिक्त चीनी पाई गई है.
दूसरा मामला हानिकारक पदार्थों से जुड़ा
नेस्ले की दूसरी चुनौती साल 2026 में सामने आई, जब कंपनी ने कुछ बैचों में बैसिलस सेरेयस से जुड़ा सेर्यूलाइड नामक विषाक्त पदार्थ पाए जाने के बाद शिशु फॉर्मूला उत्पादों की वैश्विक स्तर पर बड़ी रिकॉल की घोषणा की. यह समस्या एक थर्ड-पार्टी वेंडर द्वारा सप्लाई किए गए एआरए ऑयल से जुड़ी थी. नेस्ले ने उस सप्लायर का कॉन्ट्रैक्ट खत्म कर दिया, टेस्टिंग प्रोटोकॉल को और मजबूत किया और राइट-ऑफ व रिटर्न के कारण लगभग 18.5 करोड़ स्विस फ्रैंक का वित्तीय नुकसान दर्ज किया.
भारत पर नहीं दिखा असर
वैसे तो भारत में इस रिकॉल का ज्यादा असर नहीं पड़ा, क्योंकि नेस्ले अपने शिशु पोषण उत्पाद स्थानीय स्तर पर बनाती है. नेस्ले इंडिया ने कहा था कि उसके यहां बिकने वाले किसी भी शिशु फॉर्मूला उत्पाद पर इसका कोई असर नहीं पड़ा है और घरेलू निर्माण एफएसएसएआई की सुरक्षा मानकों का पालन करता है. हालांकि, पहले हुई चीनी विवाद ने कंपनी की साख को जरूर प्रभावित किया था और कुछ समय के लिए उसके शेयर की कीमत पर भी असर पड़ा था. इसके बाद भारतीय नियामकों ने शिशु आहार के मानकों की समीक्षा शुरू कर दी है. अब नेस्ले ने उपभोक्ताओं की चिंता को देखते हुए ‘नो एडेड शुगर’ लेबल लगाना शुरू कर दिया है.
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